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अलवर, Jun 07, 2026

Alwar: बाघों की बढ़ती आबादी से बढ़ा संघर्ष, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की सफलता बनी नई चुनौती

देश में बाघों की बढ़ती संख्या ही सरकार के लिए​ सिरदर्द बनती जा रही है। देश में बाघ संरक्षण के लिए चल रहे ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ से बाघों की संख्या बढ़ाने में मदद मिली, लेकिन संख्या के हिसाब से जंगल कम पड़ रहा है। यही वजह है कि आपसी संघर्ष में बाघों की मौत हो रही है।

tiger in sariska

सरिस्का में टाइगर की अठखेलियां

देश में बाघ संरक्षण के लिए चल रहे ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ से बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन यही बढ़ती संख्या इस प्रोजेक्ट का शिकार भी कर रही है। जंगलों का सीमित दायरा, बढ़ता मानव हस्तक्षेप और प्राकृतिक आवास पर दबाव बाघों को जंगल से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष के मामले बढ़ रहे हैं।
जनवरी से अप्रेल तक देश में 58 बाघों की मौत दर्ज की गई है, जिनमें 26 मौतें टाइगर रिजर्व (सुरक्षित क्षेत्रों) के भीतर और शेष अन्य स्थानों पर हुई हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि बढ़ती आबादी के अनुरूप बाघों के लिए जंगलों में जगह नहीं बची है। जंगल छोटे पड़ने के कारण बाघों को शिकार और पानी की तलाश में अपने पारंपरिक क्षेत्रों से बाहर निकलना पड़ रहा है, जिससे उनका सामना मानव बस्तियों से होने लगा है।

1973 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट

वर्ष 1973 में शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत देश में बाघ संरक्षण की व्यापक व्यवस्था विकसित की गई। वर्तमान में 58 टाइगर रिजर्व लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। इन संरक्षित क्षेत्रों में बाघों के साथ-साथ हाथी, भालू और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण के लिए भी विशेष प्रबंधन किया जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की बढ़ती संख्या के अनुपात में उनके लिए सुरक्षित और विस्तृत आवास सुनिश्चित करना अब समय की आवश्यकता बन गया है।

अपनी टेरेटरी में रहना पसंद करते हैं बाघ

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी वन्यजीव के लिए शिकार, पानी और सुरक्षित क्षेत्र की उपलब्धता अनिवार्य होती है। बाघ सामान्यतः अपनी टेरेटरी में रहना पसंद करते हैं, लेकिन जब जंगल का आकार सीमित होने लगता है तो उन्हें नए क्षेत्रों की तलाश करनी पड़ती है। यही कारण है कि कई बार बाघ जंगलों से निकलकर आसपास के गांवों तक पहुंच जाते हैं।

शिकार के कारण गांवों का रुख करते हैं बाघ

विशेषज्ञों के मुताबिक जंगलों के आसपास के क्षेत्रों में बाघों के लिए नीलगाय, जंगली सूअर और पालतू पशुओं का शिकार करना आसान रहता है। ऐसे में बाघ गांवों की ओर आकर्षित होते हैं और मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ने लगती हैं।

सरिस्का में भी बाघों की संख्या 56 पहुंची

सरिस्का में भी बाघ-बाघिनों की संख्या 56 पहुंच गई है। यहां अभी तक क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट को मंजूरी नहीं मिल पाई है। लगातार बढ़ रहे बाघों की संख्या यहां भी चिंता बढ़ा रही है। शावकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो आने वाले दिनों में अपनी टेरेटरी बनाएंगे। ऐसे में जंगल कम पड़ेगा। फरवरी में ही सरिस्का के जंगल में टेरिटरी को लेकर बाघ-बाघिन में लड़ाई हो गई। इसमें बाघिन एसटी-28 की मौत हो गई। कई बाघ यहां से गायब भी हो चुके हैं, जिनका आज तक पता नहीं चल पाया है।

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