RBI Gold Holdings: साल 1991 में भारत विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था और हालात इतने खराब हो गए थे कि सरकार को 46.91 टन सोना गिरवी रखकर 405 मिलियन डॉलर का कर्ज लेना पड़ा था।
India Gold Reserve: आज भारत का गोल्ड रिजर्व दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण भंडारों में से एक है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब देश के पास विदेशों से जरूरी सामान खरीदने के लिए पर्याप्त डॉलर तक नहीं बचे थे। हालात इतने बिगड़ गए थे कि सरकार को अपना सोना गिरवी रखकर कर्ज लेना पड़ा था। यह कहानी 1991 की है। वही साल जिसने भारत की आर्थिक दिशा और दशा दोनों बदल दीं।
1991 में भारत अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था। स्थिति ऐसी हो गई थी कि देश के पास केवल करीब दो सप्ताह के आयात का भुगतान करने लायक विदेशी मुद्रा बची थी। अगस्त 1990 की शुरुआत में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 5,050 करोड़ रुपये का था। मार्च 1991 तक यह घटकर 4,388 करोड़ रुपये रह गया। इसके बाद गिरावट और तेज हुई और जून 1991 के अंत तक यह सिर्फ 2,386 करोड़ रुपये पर आ गया। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विदेशी कर्ज का भुगतान और जरूरी आयात जारी रखना था।
इस संकट की सबसे बड़ी वजह 1990-91 का खाड़ी युद्ध बना। युद्ध शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ गया और भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ने लगा। उधर खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों से आने वाला पैसा भी प्रभावित हुआ। व्यापार घाटा बढ़ता गया और रुपये पर दबाव लगातार गहराता रहा। महंगाई पहले से ही डबल डिजिट में थी, इसलिए आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गईं। कहावत है कि मुसीबत अकेले नहीं आती। भारत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
संकट गहराने पर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए कई कदम उठाए। लेकिन जब कोई रास्ता नहीं बचा, तब देश ने अपने स्वर्ण भंडार का सहारा लिया। सबसे पहले अप्रैल और मई 1991 के दौरान जब्त किए गए 20 टन सोने का इस्तेमाल विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए किया गया। मगर इससे भी जरूरत पूरी नहीं हुई। इसके बाद जुलाई 1991 में भारत सरकार ने 46.91 टन सोना गिरवी रखकर 405 मिलियन डॉलर का कर्ज हासिल किया। यह सोना जापान और इंग्लैंड के केंद्रीय बैंकिंग संस्थानों के पास रखा गया था। हालांकि, राहत की बात यह रही कि कुछ ही महीनों में कर्ज चुका दिया गया और सितंबर से नवंबर 1991 के बीच पूरा सोना वापस हासिल कर लिया गया। आज तक भारत ने दोबारा ऐसा कदम नहीं उठाया है।
1991 का आर्थिक संकट केवल मुश्किलों की कहानी नहीं है। यही वह मोड़ था जहां से भारत ने बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। लाइसेंस राज में ढील दी गई, विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोले गए और अर्थव्यवस्था को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में कदम उठाए गए। इन फैसलों का असर आने वाले दशकों में दिखाई दिया। कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि अगर वह संकट नहीं आता, तो शायद भारत में आर्थिक सुधार भी इतनी तेजी से लागू नहीं हो पाते।
जिस देश को कभी 47 टन के करीब सोना गिरवी रखना पड़ा था, आज उसके पास 880 टन से ज्यादा सोना है। 31 मार्च 2026 तक भारत के स्वर्ण भंडार 880.52 टन तक पहुंच चुके थे। इससे भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार रखने वाला देश बन गया है। अमेरिका, इटली, चीन और रूस के बाद भारत का स्थान आता है।
भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कई वर्षों से लगातार सोना खरीद रहा है। 2001 में RBI के पास लगभग 358 टन सोना था। दो दशक बाद यह आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा हो चुका है। वैश्विक अनिश्चितताओं, डॉलर पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाने के लिए कई केंद्रीय बैंक सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। RBI भी इसी रणनीति पर काम कर रहा है।
पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा फायदा भारत के स्वर्ण भंडार के मूल्य को मिला है। मई 2026 तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में मौजूद सोने का मूल्य लगभग 114.78 अरब डॉलर यानी करीब 10.99 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। यह RBI की कुल विदेशी संपत्तियों का लगभग 17 से 18 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि, मूल्य बढ़ने का मतलब हमेशा नई खरीदारी नहीं होता। कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के भाव बढ़ने से भी रिजर्व का मूल्य ऊपर चला जाता है।
भारत अकेला नहीं है, जो सोना जमा कर रहा है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक पिछले कुछ वर्षों से लगातार सोना खरीद रहे हैं। साल 2023 से 2026 के बीच वैश्विक केंद्रीय बैंकों ने 2,800 टन से ज्यादा सोना खरीदा। वहीं, कुछ देशों को आर्थिक दबाव के चलते अपने भंडार का हिस्सा बेचना भी पड़ा है। यह दिखाता है कि संकट चाहे किसी भी देश पर आए, सोना आज भी सबसे भरोसेमंद सुरक्षा कवच माना जाता है।