शरीर में विभाजन का क्रम अहोरात्र चलता है। धातुओं का निर्माण, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र आदि निरन्तर कार्य करते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में अग्नि-सोम का मूल सिद्धान्त ही कार्य करता है।
ब्रह्म ने माया की रचना की अपने विस्तार के लिए। इससे पूर्व सृष्टि में नारी का अस्तित्व था ही कहां? जब भी विवर्त की आवश्यकता होती है, स्त्री आकर साथ रहती है। विवर्त के बाद यही स्त्री जीवात्मा को वहां लौटने का प्रबन्ध करती है जहां से इस विश्व में आया था। स्वयं भी साथ ही लौट जाती है। हम वर्षाजल के दृष्टान्त से इस बात को समझ सकते हैं कि जो जहां से आता है उसका प्रत्यावर्तन भी वहीं होता है। सूर्य ब्रह्माण्ड की नाभि है, उत्पत्ति का केन्द्र है—सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च। जो सृष्टि करता है, वह मेघ इस वर्षा के तत्त्व को नहीं जानता। वह यह नहीं जानता कि मेरे भीतर पानी कहां से आया। जो इन्द्र वर्षण का प्रत्यक्षकर्ता है, उसका यह तत्त्व अन्तर्निहित होता है। इन्द्र ही इसे जानता है। जिस इन्द्र ने सूर्य में निहित वृष्टि को देखा है। माता अन्तरिक्ष का नाम है। इसमें प्राणी बनाए जाते हैं। उत्पन्न हुए प्राणियों को अवकाश देकर महान उपकार करता है।
निरुक्तकार लिखते हैं कि मेघ गर्ज रहा है, किन्तु मेघ गर्जन नहीं करता, बिजली गर्जन करती है। जिस मेघ से माध्यमिक वाणी -विद्युत रूप - गर्जन करती है, वही मेघ में रहती हुई शब्द करती है। जब विद्युत गरजती है तो मनुष्य भयभीत होकर नीचे झुक जाता है। फिर चमकती हुई बिजली अपने रूप को समेट लेती है। मेघवर्ती विद्युत अपने दोनों रूपों को (गर्जन और चमक) प्रकट करके छिप जाती है। वह रूप आश्रित को आच्छादित कर देता है। वर्षा से पृथ्वी को आच्छादित करके - जल बरसाकर - पुन: उसी पानी को सूर्य रूप से समेट लेती है। माया की इस भूमिका को हमने विस्मृत कर दिया। वह तो एक स्थूल देहधारी पशु रूप रह गई।
जीवन व्यवहार में माया को हमने भग-वती कहा तथा ब्रह्म को भग-वान। इन दोनों का कार्य क्षेत्र स्त्री का ब्रह्मद्वार है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसे धारण करने वाले को छह गुणों (धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य-यश-श्री) वाला भगवान कहते हैं। भग शब्द धन और समृद्धि वाचक है। बारह आदित्यों में एक भग है। भगवान शब्द में भी पांचों तत्व रहते हैं—भ=भूमि, ग=गगन, व=वायु, अ=अग्नि, न=नीर। भग शब्द का विज्ञान भाव में अर्थ होता है विभाजन करने वाला, बांटने वाला। सृष्टि बांटने से ही सम्भव है। पंच तत्व बंटने से ही एक दूसरे में बदलते हैं। बीज टूटकर ही अंकुर बनता है। माया ब्रह्मांश का विभाजन करती है (ईश्वर अंश जीव अविनाशी)। मां अपने शरीर से सन्तान की देह का निर्माण करती है। विभाजन ही सृजन का सिद्धान्त है। जिसके पास यह शक्ति है, वही भगवान है, वही भगवती है। अथर्ववेद में पृथ्वी को भग कहा है—भगं पृथिव्या अहमस्मि भग: (12.1.1)। अमरकोश में भग को योनि का पर्याय कहा है। भग ही वह ब्रह्मद्वार है जहां सृजन का आरंभ और अन्त होता है। यह गर्भरूपी यज्ञशाला में प्रवेश और निर्गमन का द्वार है। इस द्वार से प्रविष्ट जीव का पोषण व विकास गर्भाशय में होता है।
गर्भाशय ही वह क्षेत्र है जहां विभाजन भी होता है और संतुलन भी। यह वह पवित्र क्षेत्र है जहां जीवात्मा का प्रवेश, शरीर रचना और कर्मफल का भोग आरंभ होता है। पुरुषसूक्त में एक विराट् पुरुष से अनेक देवता और लोकों के उद्भव को दिखाया है। गर्भ में भी यही क्रम होता है। एक निषेचित बीज (युग्मज) से विभाजित होते हुए अरबों कोशिकाएं, विविध अंग, इन्द्रियां आदि बन जाते हंै। यह माया की विक्षेप शक्ति का सशक्त प्रमाण है। एक से अनेक होना। यह विभाजन संतुलित भाव में होता है। गर्भोपनिषद् में वर्णन है कि किस प्रकार आत्मा के संकल्प से क्रमश: सप्तधातुएं, मांसपेशियां, अस्थियां आदि बनती है। कोई जीव किसी एक योनि को छोड़कर आया है। उसके संस्कारों को विभाजित करना पड़ेगा, तब ही तो उस पर नई योनि के संस्कार दिये जा सकते हैं। यही लय या संतुलन का अर्थ है। यही भगवत् कार्य है।
शरीर में विभाजन का क्रम अहोरात्र चलता है। धातुओं का निर्माण, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र आदि निरन्तर कार्य करते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में अग्नि-सोम का मूल सिद्धान्त ही कार्य करता है। दोनों एक दूसरे में बदलते रहते हैं, नष्ट नहीं होते। विज्ञान इनको ऊर्जा और मैटर कहता है। मूल में दोनों एक ही हैं। अग्नि ही ऊपर जाकर सोम बन जाता है, सोम ही नीचे आकर अग्नि बन जाता है।
प्रत्येक मादा के भीतर सृष्टि के सिद्धान्त समान रूप से कार्य करते हैं। स्त्री जिस प्रकार अपने गर्भ में अन्य योनियों से आए जीवों की रचनात्मक आणविक संरचना में परिवर्तन करती है, वैसे ही अन्य योनियों की माताएं भी अन्य योनियों से आने वाले आत्माओं के लिए देह का निर्माण करती हैं। उनकी आणविक संरचना बदलती है। प्रत्येक प्रजाति का गर्भाशय अपनी योनि (सिंह, कंगारू, मानव आदि) के अनुकूल संतुलन स्थापित करता है। कंगारू का गर्भ छोटा व थैली में विकास, प्लैटिपस (ऑस्ट्रेलियन बत्तख) का अंडा देना, मनुष्य का सुविकसित गर्भनाल (प्लेसेंटा) यह सब कर्मबीज के अनुसार गर्भक्षेत्र द्वारा रचित विविधता है। अंगों का निर्माण त्वष्टा करता है। वही प्रत्येक योनि में भग-आदित्य के साथ प्रतिष्ठित रहता है। ऋग्वेद संहिता में कहा गया है कि प्रात: ही अंधकार को जीतने वाले - उदय होने के लिए उद्यत हुए देवमाता के पुत्र भग को हम पुकारते हैं। यह प्राणियों का धारण करने वाला है। इसको दरिद्र - राजा - यमराज भी (जिसको) चाहते हैं—
प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता ।
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥ (ऋ. 7.41.2.)
मूल रूप से भग भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र की अति सूक्ष्म कोटि की रसायनशाला है। इसमें एक ओर अर्थब्रह्म (अन्न) आधारित स्थूल शरीर का निर्माण होता है। माता अपने अंगों को विभाजित करके गर्भस्थ शिशु के शरीर का निर्माण करती है। माता के रक्त में अन्न के सभी तत्व रहते हैं। जो रक्त समयबद्ध ढंग से बाहर निकलता रहता है, वही रक्त शिशु की देह के निर्माण में काम आ जाता है।
अन्न चन्द्रमा से पैदा होता है। अन्न से शरीर उत्पन्न होता है। अन्न से ही मन का निर्माण होता है। मन ही परा शक्ति द्वारा, नाद ब्रह्म के माध्यम से, तथा भावनात्मक रूप में शिशु के मन को संस्कारित करता है। मन को किसी भाषा की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म मन से भी तेज दौड़ता है। चन्द्रमा के नियंत्रण में जीवात्मा देह, संस्कार, पितर प्रतिष्ठा धारण करता है। शरीर के ताप में अवधिपर्यन्त पकता है। बाहरी धूप-छांव में जीने को तैयार होता है। अवधि पूर्ण होते ही इसी ब्रह्ममार्ग से शरीर भूमिष्ठ हो जाता है।
मृत्यु काल में जीवात्मा पुन: स्थूल देह छोड़कर सूक्ष्म देह में जाता है। किन्तु वर्तमान जीवन के संस्कार कर्मफल रूप में साथ जाते हैं। उनसे ही नए प्रारब्ध और योनि का निर्माण होता है। माया ही नई योनि का पथ-प्रदर्शन करती है। उसका उद्देश्य तो जीव को इस संसारचक्र में घुमाते रहना ही है। यही माया की भ्रांति अवस्था है—
या देवी सर्वभूतेषु भ्रांति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com