Bhagavad Gita for Depression: जानिए कैसे श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश आज के युवाओं को मानसिक तनाव और नकारात्मक विचारों के चक्रव्यूह से बाहर निकाल सकते हैं।
Bhagavad Gita for Anxiety and Depression: आज की इस अंधी दौड़, करियर के दबाव और टूटते रिश्तों के बीच एक महामारी बेहद खामोशी से पैर पसार रही है। इसे हम डिप्रेशन, एंग्जायटी या मानसिक तनाव कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वर्ष 2019 में दुनिया भर में लगभग 28 करोड़ (280 मिलियन) लोग डिप्रेशन से प्रभावित थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब इंसान की सारी उम्मीदें टूट जाती हैं और दिमाग नकारात्मक विचारों का घर बन जाता है, तब 5000 साल पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में गूंजी भगवान श्रीकृष्ण की आवाज आज भी एक बेहतरीन साइकियाट्रिस्ट की तरह काम करती है।
जब हम लगातार सोचने लगते हैं कि मेरा जीवन बर्बाद हो गया या कोई मुझसे प्यार नहीं करता, तो हमारा दिमाग नकारात्मक पैटर्न्स बना लेता है। मेडिकल साइंस की भाषा में इसे अमिग्डाला हाईजैक' (Amygdala Hijack) कहते हैं, जहां डर के कारण दिमाग में कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स बढ़ जाता है और इंसान की सोचने-समझने की क्षमता खत्म हो सकती है।
लेकिन वैदिक दर्शन इसका इलाज बहुत गहराई से करता है। डर या डिप्रेशन असली बीमारी नहीं है, यह तो सिर्फ लक्षण है। असली बीमारी है 'आसक्ति' (Attachment)। हम जिस चीज से बहुत ज्यादा चिपक जाते हैं चाहे वह पैसा हो, रुतबा हो, सेहत हो या कोई इंसान उसे खोने का डर हमें भीतर ही भीतर खाने लगता है।
इसी बात को पुख्ता करते हुए गीता के दूसरे अध्याय के 62वें श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं:
ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थात्, जब हम सांसारिक चीजों के बारे में लगातार सोचते हैं, तो उनसे लगाव हो जाता है। लगाव से इच्छाएं (Desires) पैदा होती हैं और जब इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, तो गुस्सा और मानसिक तनाव जन्म लेता है।
आजकल लोग एंटी-डिप्रेसेंट दवाओं के सहारे जी रहे हैं, लेकिन गीता इसका एक बेहद खूबसूरत और मुफ्त इलाज बताती है कृतज्ञता यानी जो हमारे पास है, उसके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करना। जब हम केवल अपनी कमियों को देखते हैं, तो दिमाग नकारात्मकता को खींचने लगता है।
गीता के 12वें अध्याय के 17वें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भक्त न तो सांसारिक सुखों में बहुत ज्यादा उछलता है और न ही दुखों में रोता है, जो हर हाल में संतुष्ट और ईश्वर के प्रति समर्पित रहता है, वही सच्चा शांतिप्रिय और प्रिय भक्त है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति |
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: || 17||
यह सिर्फ किताबी बातें नहीं हैं। आज दुनिया के बड़े-बड़े देश और वैज्ञानिक संस्थान भगवद्गीता आधारित थेरेपी' (Gita-Based Cognitive Behavioral Therapy) पर रिसर्च कर रहे हैं।
गीता के 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि' (फल की चिंता किए बिना कर्म करना) के सिद्धांत को अपनाने से एंग्जायटी के स्तर को कम करने में मददगार हो सकती है ।
माइंडफुलनेस का प्राचीन रूप: आज पश्चिमी देशों में जिस माइंडफुलनेस और मेडिटेशन को कूल माना जा रहा है, वह असल में गीता का छठा अध्याय (ध्यान योग) ही है।
यदि आप लंबे समय से डिप्रेशन, पैनिक अटैक या गंभीर मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। गीता के उपदेश मानसिक मजबूती और आत्मचिंतन में सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे पेशेवर चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं हैं।