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Dholpur: राजस्थानी भाषा के नाम पर मारवाड़ी थोपने के खिलाफ जिलेभर में आक्रोश

धौलपुर. राजस्थान की भाषाई पहचान और शिक्षा संस्कृति पर मंडराते खतरे को देखते हुए धौलपुर जिले के अलग-अलग हिस्सों में विरोध की आग तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ में मारवाड़ी को पूरी राजस्थानी भाषा के रूप में थोपने की कोशिशों के खिलाफ अब युवा वर्ग, छात्र और स्थानीय लोग सडक़ों पर उतर आए हैं और फैसले को वापस लेने की मांग की जा रही है।

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धौलपुर. राजस्थान की भाषाई पहचान और शिक्षा संस्कृति पर मंडराते खतरे को देखते हुए धौलपुर जिले के अलग-अलग हिस्सों में विरोध की आग तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ में मारवाड़ी को पूरी राजस्थानी भाषा के रूप में थोपने की कोशिशों के खिलाफ अब युवा वर्ग, छात्र और स्थानीय लोग सडक़ों पर उतर आए हैं और फैसले को वापस लेने की मांग की जा रही है। वहीं, दो दिन पहले जिले के बसेड़ी उपखंड मुख्यालय पर भाजपा के पूर्व विधायक सुखराम कोली ने प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए सीएम के नाम ज्ञापन सौंपा। इसी तरह बाड़ी और सैंपऊ में भी युवाओं ने विरोध जताया।

पूर्वी राजस्थान के जिले भरतपुर, डीग और धौलपुर जिले में मारवाड़ी को राजस्थानी भाषा घोषित करने के विरोध बढ़ रहा है। छात्र और युवाओं के साथ समाजिक संगठन, राजनीतिक चेहरे भी सडक़ों पर उतर विरोध का स्वर बुलंद कर रहे हैं। इस कड़ी में युवाओं ने पहले जहां बसेड़ी और बाड़ी में रैलियां निकालकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंप सभाएं आयोजित की थीं। वहीं सैंपऊ ब्लॉक में मशाल जुलूस निकाल आर-पार की लड़ाई की चेतावनी दी। तो वहीं आगामी दिनों में धौलपुर जिले के सभी ब्लॉकों में जन जाग्रति रैलियां निकालकर जिला मुख्यालय पर विरोध सभा का आयोजन किया जाएगा। जिसमें पूर्वी जिलों के हजारों छात्र और युवा शामिल होकर अपनी आवाज और प्रखर करेंगे।

2023 रीट परीक्षा में परीक्षार्थियों को हुआ नुकसान

2023 रीट शिक्षक भर्ती में करीब 8-10 मारवाड़ी प्रश्नों को शामिल किया गया, जो पूर्वी राजस्थान के प्रतियोगियों के लिए नुकसानदायक रहा, क्योंंकि अधिकतर परीक्षार्थियों का भाषा का ज्ञान नहीं होने से प्रश्नों के सही जवाब नहीं दे सके। अब ऐसी स्थिति में मारवाणी भाषा का राजस्थानी भाषा बनाया गया तो आने वाले में पूर्वी राजस्थान के विद्यार्थी भाषा ज्ञान नहीं होने के कारण हर परीक्षाओं में पिछड़ते रहेंगे।

ब्रज और मेवाती पूर्वी क्षेत्र की भाषा

देखा जाए तो पूर्वी राजस्थान में राजस्थानी संस्कृति की झलक कम ही देखने को मिलती है, विशेषकर भरतपुर, धौलपुर और डीग जिले में। जहां भाषाओं का भी फर्क देखा जाता है। इन जिलों में ब्रजभाषा और मेवाती भाषा ही बोली जाती है। स्थानीय लोगों और छात्रों का तर्क है कि मारवाड़ी को राजस्थानी के रूप में मान्यता देने या स्कूलों में पढ़ाने से उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

बढ़ेगा क्षेत्रीय असंतुलन, भाषा का विरोध नहीं

पूर्व विधायकपूर्व विधायक कोली ने कहा कि ब्रज, ढूंढाढ़ी, मारवाड़ी, मेवाती, मालवी आदि हिंदी भाषा की ही अंग हैं। किसी एक भाषा को बढ़ावा मिलने से क्षेत्रीय असंतुलन होगा। क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों में अतिरिक्त विषय के रूप में स्थानीय भाषा को शामिल कर सकते हैं। कोली ने कहा कि हम किसी भाषा के विरोध में नहीं है। लेकिन पूर्वी राजस्थान के बच्चों के साथ यह न्याय नहीं होगा। उधर, इस मुद्दे पर सत्ताधारी दल भाजपा के बड़े पदाधिकारी और नेता इस पर चुप्पी साधे हुए हैं।