
Middlemen 'rob' the sweat of the farmer
भीलवाड़ा जिले के खेतों में सोना उगलने वाली मक्का किसानों के लिए जी का जंजाल बन गई है। मेवाड़ का यह क्षेत्र मक्का उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद सरकारी उपेक्षा का शिकार है। आलम यह है कि छह महीने तक हाड़-तोड़ मेहनत कर फसल तैयार करने वाले अन्नदाता को उसकी लागत तक नहीं मिल पा रही है, जबकि व्यापारी उसी फसल को ऊंचे दामों पर बेचकर तिजोरी भर रहे हैं। सरकार की ओर से समर्थन मूल्य पर खरीद की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने के कारण किसान अपनी उपज को औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं।
मंडी के समीकरणों पर नजर डालें तो किसान और व्यापारी के बीच मुनाफे की एक गहरी खाई नजर आती है। किसान को अपनी मक्का महज 1400 से 1600 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर बेचनी पड़ रही है। वहीं, मंडी व्यापारी इसी मक्का को आगे 2100 से 2350 रुपए तक के भाव में सप्लाई कर रहे हैं। व्यापारियों का तर्क है कि दाम दूरी और मांग के आधार पर तय होते हैं।
सिर्फ किसान ही नहीं, मंडी से जुड़े मजदूर (हमाल) भी कम मजदूरी की मार झेल रहे हैं। व्यापारी के अनुसार, मक्का की बोरियां खाली करने, उसे छानने और फिर से भरकर लोडिंग करने जैसे कठिन परिश्रम के बदले हमाल को मात्र 18 रुपए प्रति क्विंटल की दर से मेहनताना दिया जा रहा है। महंगाई के इस दौर में यह मजदूरी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। किसान बालू गाड़री का कहना है कि सरकार यदि समर्थन मूल्य की घोषणा कर खरीद शुरू करे, तो उन्हें सही दाम मिल सकते हैं। सरकारी खरीद केंद्र न होने के कारण किसान अपनी घरेलू जरूरतों और कर्ज चुकाने के दबाव में गांव के बिचौलियों या स्थानीय व्यापारियों को फसल सौंपने को मजबूर हैं।
सप्लाई क्षेत्र विक्रय मूल्य
मूल्य प्रति क्विंटल के है।
भीलवाड़ा जिले में मक्का की फसल का उत्पादन
Published on:
17 Jan 2026 10:04 am
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