
breastfeed प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- freepik)
AIIMS Study: एम्स भोपाल और एम्स भुवनेश्वर के संयुक्त अध्ययन में सामने आया है कि 96 प्रतिशत माताएं अपने जुड़वां शिशुओं को छह महीने तक स्तनपान नहीं करा पातीं है। शोध में 70 प्रतिशत माताओं में अत्यधिक शारीरिक थकान को इसका कारण बताया है। दूध की कमी का डर और एक साथ दो शिशुओं की देखभाल भी बड़ी समस्या रही।
इसका असर बच्चों के स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। अध्ययन में सामने आया कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद कई माताओं ने 1 से 2 वर्ष तक स्तनपान जारी रखा। कुछ माताओं ने दोनों शिशुओं को एक साथ दूध पिलाने की अलग तकनीक भी अपनाई।
अध्ययन के अनुसार जुड़वां बच्चे अक्सर समय से पहले जन्म लेते हैं या उनका वजन कम होता है। इनमें संक्रमण और कुपोषण का खतरा अधिक रहता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जन्म से पहले छह महीने केवल स्तनपान ही उन्हें बीमारियों से बचाने और स्वस्थ विकास के लिए सबसे प्रभावी उपाय है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि लक्ष्य-आधारित दबाव के बजाय माताओं को सहानुभूतिपूर्ण सहयोग, सही स्तनपान मुद्राएं और भावनात्मक समर्थन देना जरूरी है। किसी भी मात्रा में स्तनपान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
एम्स भोपाल के प्रभारी कार्यकारी निदेशक प्रो. डॉ. माधवानंद कर ने कहा कि यह अध्ययन जुड़वां शिशुओं की माताओं की वास्तविक चुनौतियों को सामने लाया है और मातृ-शिशु स्वास्थ्य नीतियों को अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
यह शोध एम्स भोपाल की सहायक प्राध्यापक डॉ. गीता भारद्वाज और एम्स भुवनेश्वर की डॉ. एम. वी स्मिथा द्वारा केरल के कोडिन्ही गांव में किया गया। यह गांव देश में सबसे अधिक और दुनिया में दूसरे स्थान पर सबसे ज्यादा जुड़वां जन्म दर के लिए जाना जाता है। यहां करीब 400 जोड़ी जुड़वां बच्चे हैं।
Published on:
27 Jan 2026 01:54 pm
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