
Health news (Photo Source: AI Image)
Health news: तेजी से बढ़ता निर्माण कार्य विकास की तस्वीर तो पेश कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही एक ऐसा अदृश्य खतरा भी फैल रहा है, जो आम लोगों की सांसों को धीरे-धीरे बीमार बना रहा है। रेत, पत्थर और सीमेंट से उठने वाली निर्माण धूल अब केवल मजदूरों तक सीमित नहीं रही।
यह भोपाल सहित प्रदेश के शहरों में रहने वाले बच्चों और बुजुर्गों के फेफड़ों तक पहुंच रही है और गंभीर बीमारियों की वजह बन रही है। सांस रोग विशेषज्ञ डॉ. लोकेन्द्र दवे बताते हैं कि पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों में लंबे समय तक सूजन पैदा करते हैं। इससे सीओपीडी, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस और ए्फाइसीमा का खतरा बढ़ता है। लगातार संपर्क बना रहे तो फेफड़ों के कैंसर और किडनी रोग तक की आशंका रहती है।
निर्माण स्थलों से उडऩे वाले सूक्ष्म सिलिका कण इतने बारीक होते हैं कि ये सांस के साथ सीधे फेफड़ों के अंदर एल्वियोली तक पहुंच जाते हैं। यही एल्वियोली शरीर में ऑक्सीजन के आदान-प्रदान का काम करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जब ये पारदर्शी कण वहां जमा होते हैं तो धीरे-धीरे सांस की तकलीफ और स्थायी नुकसान शुरू हो जाता है।
108 एंबुलेंस रेकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2025 में सांस रोग के 1,321 से अधिक मरीज अस्पताल पहुंचे। 2024 में यह संख्या 1,026 और 2023 में 985 थी। ठंड और धूल के मौसम में ओपीडी में सांस रोग के मामले 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं।
भोपाल सहित अन्य शहरों में सिलिका युक्त धूल के कारण सिलिकोसिस, न्यूमोकोनियोसिस, सीओपीडी, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, ए्फाइसीमा, फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है। लंबे समय तक दूषित हवा में रहने से ये बीमारियां शरीर को जकड़ लेती हैं।
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर समेत प्रदेश के 55 जिला मुख्यालयों में से 29 की वायु गुणवत्ता खतरे के स्तर से ऊपर है। इन शहरों की हवा में 18 से 20 प्रतिशत पीएम 2.5 सूक्ष्म कण पाए गए हैं। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के मुताबिक, खुदाई, सड़क निर्माण, अर्थवर्क और निर्माण स्थलों पर वाहनों की आवाजाही धूल के मुख्य स्रोत हैं। कच्ची सड़कों की धूल से पीएम 2.5 का स्तर ढाई गुना तक बढ़ जाता है।
-घर से बाहर निकलते समय मास्क पहनें। धूल भरी जगहों पर या सफाई करते समय मास्क (N95) पहनें।
-घर में या गेट का बाहर मिट्टी वाली जगह हो तो पानी का छिड़काव करें।
Published on:
09 Feb 2026 12:17 pm
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