AI-generated Summary, Reviewed by Patrika
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कई दशकों तक हिंदी सिनेमा में देशभक्ति का अर्थ ज्यादातर “दुश्मन से लड़ाई” तक सीमित रहा। यह कई मायनों में स्वाभाविक भी था। आज़ादी से पहले अंग्रेज़ों से संघर्ष, फिर विभाजन के बाद पाकिस्तान और चीन से युद्ध, और उनसे उपजे हालात में देशभक्ति का सीधा मतलब था हमारी सीमाओं की रक्षा और बहादुर सिपाहियों का बलिदान। उस दौर के देशभक्ति गीतों में भी युद्धक भावनाएं केंद्र में होती थीं। धीरे-धीरे यह सिनेमा का एक हिट फार्मूला भी बन गया। युद्ध या दुश्मन के खिलाफ खड़ी कहानियां तुरंत भावनात्मक जुड़ाव देती हैं। दुश्मन पर जीत का दृश्य तत्काल संतोष देता है, जबकि समाज सुधार या व्यवस्था परिवर्तन पर आधारित देशभक्ति फिल्मों का असर धीरे-धीरे होता है, इसलिए वे बॉक्स ऑफिस पर उतनी “मसालेदार” नहीं मानी जातीं।
देशभक्ति को लेकर बदला है दृष्टिकोण
रंगकर्मी और फिल्म समीक्षक नवल किशोर व्यास कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में सिनेमा में देशभक्ति को लेकर दृष्टिकोण बदला है। अब यह सिर्फ सीमा पर दुश्मन से लड़ाई तक सीमित नहीं, बल्कि नागरिक के व्यक्तिगत कर्तव्य और जिम्मेदारी तक फैल गया है। राजकुमार राव की “न्यूटन” को ही लीजिए—यह फिल्म युद्ध या राजनीति के शोरगुल में नहीं, बल्कि एक आदर्शवादी सरकारी कर्मचारी की ईमानदारी पर केंद्रित है, जो अपने कर्तव्य के निर्वहन के लिए पागलपन की हद तक जा सकता है। आशुतोष गोवारिकर की “स्वदेश” भी केवल प्रवासी भारतीय की घर वापसी की कहानी नहीं है। यह गांधीजी के सामाजिक और नैतिक सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में आजमाने और उन्हें सफल होते देखने की यात्रा है। एक ऐसी यात्रा, जो भौगोलिक होने के साथ-साथ विचारधारा की भी है।
सुधार भी बना देशभक्ति दिखाने का माध्यम
हिंदी सिनेमा में समाज सुधार के माध्यम से देशभक्ति दिखाने की परंपरा पुरानी है। विमल रॉय की “दो बीघा जमीन” जमींदारी प्रथा के खिलाफ एक गरीब किसान की संघर्षगाथा है। “बूटपॉलिश” अनाथ बच्चों की आत्मनिर्भरता और शिक्षा के महत्व को रेखांकित करती है। मनोज कुमार की “उपकार” में लाल बहादुर शास्त्री के “जय जवान, जय किसान” के मूल विचार में हरित क्रांति और ग्रामीण विकास का संदेश था। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की “रंग दे बसंती” युवाओं की राजनीतिक जागरूकता जगाती है। राजकुमार हीरानी की “थ्रीइडियट्स” शिक्षा प्रणाली में सुधार और अपनी क्षमता व इच्छा के अनुरूप कार्य करने की बात करती है।
युद्धक फिल्मों के साथ नागरिकों को सजग करती फिल्में
सनी देओल की “गदर” और “बॉर्डर” जैसी युद्धक गाथाओं के साथ-साथ “स्वदेश” और “न्यूटन” जैसी फिल्मों में दिखी सजग नागरिक की व्यक्तिगत देशभक्ति को भी स्वीकार और सराहा जाना चाहिए। आखिरकार, देशभक्ति सिर्फ सीमा पर लड़ने वालों तक सीमित नहीं, यह उन नागरिकों की भी है जो अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करते हैं, समाज को बेहतर बनाने में हिस्सा लेते हैं और अपने काम से राष्ट्र की मजबूती में योगदान देते हैं।
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लव सोनकर
लव सोनकर - 9 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले 7 सालों से डिजिटल मीडिया से जुड़े हुए हैं और कई संस्थानों में अपना योगदान दि है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता ए...और पढ़ें...
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Published on:
15 Aug 2025 08:02 pm


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