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2014 में भारत को आजादी मिली बोलने वालीं कंगना बोलीं- वीर सावरकर भारत रत्न से ऊपर, मोहन भागवत का किया समर्थन

Kangana Ranaut on Veer Savarkar Bharat Ratna: स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को भारत रत्न देने की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इसी कड़ी में अब अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी अपना बयान दिया है।

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Kangana Ranaut on Veer Savarkar Bharat Ratna

Kangana Ranaut-Mohan Bhagwat (सोर्स- एक्स)

Kangana Ranaut on Veer Savarkar Bharat Ratna: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बहस को नया मोड़ तब मिला, जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अगर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो इससे पुरस्कार की गरिमा और बढ़ेगी। उनके इस बयान पर अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत खुलकर सामने आईं और उन्होंने पर इस पर बयान दिया

कंगना रनौत ने वीर सावरकर पर क्या कहा? (Kangana Ranaut on Veer Savarkar Bharat Ratna)

कंगना रनौत ने कहा कि मोहन भागवत की भावना सिर्फ उनकी निजी राय नहीं, बल्कि देश के करोड़ों नागरिकों की आवाज है। उनके मुताबिक, वीर सावरकर का योगदान किसी एक सम्मान से नहीं आंका जा सकता। उन्होंने ये भी कहा कि अगर भविष्य में सावरकर को भारत रत्न मिलता है, तो ये हर भारतीय के लिए गर्व का विषय होगा।

मोहन भागवत का बयान

आरएसएस के एक कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने सावरकर को लेकर पूछे गए सवालों पर कहा था कि वो फैसले लेने वाली समिति का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन अगर उन्हें अवसर मिला तो वे इस विषय को जरूर उठाएंगे। उनका मानना है कि सावरकर का कद इतना बड़ा है कि भारत रत्न मिलने से उनका नहीं, बल्कि सम्मान का स्तर और ऊंचा होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सावरकर पहले ही करोड़ों लोगों के दिलों में स्थान बना चुके हैं।

कंगना का आजादी वाला विवाद

बता दें साल 2021 में कंगना रनौत ने एक ऐसा बयान दे दिया था जिसे लेकर विपक्ष ने उन पर काफी हमला बोला है। दरअसल अभिनेत्री कंगना रनौत ने ये कहकर विवाद खड़ा कर दिया है कि भारत को ‘1947 में आजादी नहीं, बल्कि भीख मिली थी’ और ‘जो आजादी मिली है वो 2014 में मिली’ जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई।

कौन थे वीर सावरकर?

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को हुआ था। वो सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि कवि, लेखक, विचारक और समाज सुधारक भी थे। बहुत कम उम्र में उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। ब्रिटिश शासन के दौरान उन्हें अंडमान-निकोबार की सेल्युलर जेल में कैद किया गया, जहां उन्होंने अमानवीय यातनाएं सहीं, लेकिन अपने विचारों से समझौता नहीं किया।

सावरकर ने विदेश में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने क्रांतिकारी संगठनों से जुड़कर अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ बुलंद की और कई किताबों के ज़रिये युवाओं को राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता के विचार से जोड़ा।

सम्मान पर बढ़ता राजनीतिक मतभेद

सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग वर्षों से उठती रही है। एक वर्ग उन्हें महान देशभक्त और विचारक मानता है, जबकि दूसरा वर्ग उनके कुछ विचारों और ऐतिहासिक फैसलों को लेकर सवाल उठाता रहा है। यही कारण है कि यह मुद्दा अक्सर राजनीतिक और वैचारिक बहस का केंद्र बन जाता है।

कंगना रनौत के ताजा बयान के बाद ये बहस फिर तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि सावरकर को उनके बलिदान और विचारों के लिए सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए, जबकि विरोधी पक्ष इसे इतिहास और राजनीति के जटिल संदर्भों से जोड़कर देखता है।

सम्मान से ऊपर विरासत

कंगना रनौत का साफ कहना है कि सावरकर की विरासत किसी पुरस्कार की मोहताज नहीं है। उनके अनुसार, ऐसे व्यक्तित्व इतिहास में अपने विचारों और संघर्ष से अमर हो जाते हैं। भारत रत्न मिले या न मिले, सावरकर का स्थान भारतीय इतिहास में अटल रहेगा।