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India-US Deal: ‘जहां सस्ता तेल मिलेगा, वहां से लेंगे’, भारत ने अमेरिका को दो टूक सुनाया अपना फैसला

National Interest: वैश्विक भू-राजनीतिक दबावों के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया है। अमेरिका के साथ चल रही व्यापारिक बातचीत (Trade Deal) के बीच नई दिल्ली ने यह बात साफ कर दी है कि ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के मामले में वह किसी भी बाहरी दबाव के आगे […]

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भारत

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MI Zahir

Feb 03, 2026

India US Trade Deal

भारत के रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका को आपत्ति है। (फोटो: X Handle/ Megh Updates.)

National Interest: वैश्विक भू-राजनीतिक दबावों के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया है। अमेरिका के साथ चल रही व्यापारिक बातचीत (Trade Deal) के बीच नई दिल्ली ने यह बात साफ कर दी है कि ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के मामले में वह किसी भी बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। भारत ने 'लक्ष्मण रेखा' खींचते हुए साफ शब्दों में कहा है कि देश के नागरिकों का हित सर्वोपरि है और जहां से भी सस्ता कच्चा तेल मिलेगा, भारत उसे खरीदने के लिए स्वतंत्र है।

'सस्ता तेल हमारी जरूरत, मजबूरी नहीं'

सूत्रों के मुताबिक, व्यापार समझौते की शर्तों पर चर्चा के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। भारत का रुख एकदम साफ है— दुनिया के बाजार में जहां भी प्रतिस्पर्धी दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध होगा, भारतीय रिफाइनरी कंपनियां उसे खरीदेंगी। सरकार का तर्क है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। ऐसे में, अगर रूस या किसी अन्य देश से डिस्काउंट पर तेल मिल रहा है, तो उसे ठुकराना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक होगा। भारत ने अमेरिका को यह संदेश दे दिया है कि ऊर्जा आयात को द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की शर्तों से अलग रखा जाना चाहिए।

140 करोड़ भारतीयों का हित सबसे पहले

भारतीय वार्ताकारों ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी अपने 140 करोड़ नागरिकों को किफायती दरों पर पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा उपलब्ध कराना है। अगर भारत महंगे बाजार से तेल खरीदता है, तो देश में महंगाई बेकाबू हो सकती है, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। इसलिए, 'सस्ता तेल' खरीदना केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि व्यापक जनहित का मुद्दा है। भारत ने यह भी साफ किया कि उसका यह फैसला किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के पक्ष में है।

कूटनीतिक संतुलन और मजबूती

यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिमी देश, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ, भारत पर रूसी तेल का आयात कम करने का दबाव बनाते रहे हैं। लेकिन भारत ने अपनी कूटनीतिक कुशलता से यह साबित कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी तो चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता (Sovereignty) की कीमत पर नहीं। भारत ने इस 'ट्रेड डील' में उन बिंदुओं पर स्पष्ट 'ना' कह दिया है जो उसकी दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल सकते थे।

दुनिया में आत्मनिर्भरता की गूंज

जानकारों का मानना है कि भारत का यह बयान वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती हुई ताकत को दर्शाता है। पहले जहां भारत दबाव में आ जाता था, वहीं अब 'नया भारत' अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करता है। यह फैसला न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता देगा, बल्कि ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के लिए भी एक उदाहरण पेश करेगा कि राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता किए बिना भी महाशक्तियों के साथ रिश्ते निभाए जा सकते हैं।