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India-US trade deal: चीन को झटका, एयरबस ने बताया ‘गेमचेंजर’, जानें भारत की कंपनियों की कैसे खुलेगी ग्लोबल लॉटरी

Aerospace Manufacturing: एयरबस ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की तारीफ करते हुए इसे भारतीय कंपनियों के लिए गेमचेंजर बताया है। विमान के पुर्जों पर शुल्क घटने से भारत अब ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन का मुख्य केंद्र बनेगा।

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भारत

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MI Zahir

Feb 08, 2026

India US zero tariff trade deal

India US zero tariff trade deal

Supply Chain: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement)के ढांचे ने ग्लोबल एयरोस्पेस इंडस्ट्री में हलचल तेज कर दी है। इस ऐतिहासिक कदम की एयरबस इंडिया (Airbus India) और दक्षिण एशिया के प्रेसीडेंट व मैनेजिंग डायरेक्टर (MD), जुर्गन वेस्टरमेयर ने जम कर तारीफ की है। उन्होंने इसे(India-US Trade Deal) भारतीय आपूर्तिकर्ताओं (Suppliers) के लिए वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनाने का एक सुनहरा रास्ता बताया है।

एयरोस्पेस सेक्टर पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ Aerospace Manufacturing)

भारतीय सप्लायर्स के लिए ग्लोबल मौके रविवार को जारी अपने बयान में जुर्गन वेस्टरमेयर ने कहा कि यह समझौता केवल टैक्स या शुल्क कम करने तक सीमित नहीं है। इसका असर इससे कहीं ज्यादा बड़ा और दूरगामी होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि एयरोस्पेस सेक्टर पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ है। इसमें कोई भी देश अकेले काम नहीं कर सकता। ऐसे में, यह नया ढांचा विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) को अपनी खरीद की रणनीति बदलने में मदद करेगा। इसका सीधा मतलब है कि अब विदेशी कंपनियां केवल एक देश पर निर्भर रहने के बजाय भारत जैसे देशों से सामान खरीदने (सोर्सिंग) में विविधता ला सकेंगी।

जोखिम कम होगा, व्यापार बढ़ेगा

वेस्टरमेयर ने 'सोर्सिंग स्ट्रैटेजी' में विविधता लाने की बात पर जोर दिया। आसान भाषा में कहें तो, विदेशी कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन को जोखिम से बचाने के लिए भारत को एक बड़े पार्टनर के तौर पर देख रही हैं। एयरबस एमडी का मानना है कि इस समझौते से भारतीय कंपनियों के लिए ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन में शामिल होना आसान हो जाएगा। यह कदम 'मेक इन इंडिया' के लिए भी एक बड़ा बूस्टर साबित हो सकता है।

टैरिफ घटने से मिलेगी राहत

वाणिज्य मंत्रालय और व्हाइट हाउस के संयुक्त बयान के मुताबिक, अमेरिका अब भारत से आने वाले कुछ खास विमानों और विमान के पुर्जों (Spare Parts) पर लगने वाले आयात शुल्क (Import Duty) को हटा देगा। पहले ये शुल्क राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर लगाए गए थे।

एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में बहुत पैसा

वेस्टरमेयर ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा, "एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में बहुत पैसा लगता है (Capital Intensive)। ऐसे में, अगर टैक्स और नीतियों में स्थिरता रहती है, तो विकास लगातार होता रहता है। मुझे उम्मीद है कि शुल्क में कमी आने से भारतीय आपूर्तिकर्ता बिना किसी बाधा के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना पाएंगे।"

क्या हैं समझौते के मुख्य बिंदु ?

अमेरिका और भारत ने आपसी सहमति से एक ऐसे ढांचे को मंजूरी दी है जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद है।

18% टैरिफ: समझौते के तहत, अमेरिका भारत में बनी कुछ वस्तुओं पर 18 प्रतिशत की पारस्परिक टैरिफ दर लागू करेगा। इन वस्तुओं में कपड़े, जूते, चमड़ा, प्लास्टिक, रबर और कुछ मशीनरी शामिल हैं।

शुल्क मुक्ति: अगर यह अंतरिम समझौता सफल रहता है, तो अमेरिका 5 सितंबर, 2025 के कार्यकारी आदेश के तहत कई चीजों से टैक्स हटा लेगा। इसमें सामान्य दवाएं, रत्न-आभूषण, हीरे और सबसे महत्वपूर्ण—विमान के पुर्जे शामिल हैं।

यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को एक नए स्तर पर ले जाने की तैयारी है, जिसका सबसे बड़ा फायदा भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मिलने की उम्मीद है।

इंडस्ट्री में उत्साह, लेकिन सतर्कता भी

एयरबस के इस सकारात्मक बयान के बाद भारतीय डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर की छोटी और मझोली कंपनियों (MSMEs) में उत्साह है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विमान के पुर्जों पर से अमेरिकी ड्यूटी हटती है, तो भारत में टाटा, महिंद्रा एयरोस्पेस और डायनामाइटिक टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियों के ऑर्डर बुक में भारी उछाल आ सकता है। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि 18% टैरिफ वाली श्रेणी में जो वस्तुएं (कपड़े, जूते) रखी गई हैं, उस पर भारतीय निर्यातकों की प्रतिक्रिया का अभी इंतजार करना होगा।

अब है सूची का इंतजार

वाणिज्य मंत्रालय जल्द ही उन भारतीय कंपनियों और उत्पादों की विस्तृत सूची जारी कर सकता है जिन्हें ड्यूटी हटाने से सीधा फायदा होगा।

अमेरिकी संसद की मुहर

क्या इस कार्यकारी आदेश को अमेरिकी राजनीतिक हलकों में आसानी से स्वीकार किया जाएगा? इस पर नजर रखनी होगी।

एयरबस की अगली चाल

जुर्गन वेस्टरमेयर के बयान के बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या एयरबस आने वाले महीनों में भारत से सोर्सिंग बढ़ाने के लिए किसी नई साझेदारी या निवेश की घोषणा करती है।

'चीन प्लस वन' रणनीति की ओर इशारा

चीन का विकल्प बनने की ओर भारत इस पूरी खबर का एक भू-राजनीतिक (Geopolitical) एंगल भी है। एयरबस एमडी ने जिस "सोर्सिंग रणनीतियों में विविधता" (Diversify Sourcing Strategies) की बात की है, वह सीधे तौर पर 'चीन प्लस वन' (China Plus One) रणनीति की ओर इशारा है।

वाशिंगटन नई दिल्ली को एयरोस्पेस हब बनाना चाहता है

पश्चिमी देश और बड़ी एयरोस्पेस कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं। अमेरिका का भारत के साथ विमान पुर्जों पर शुल्क हटाना यह संकेत देता है कि वाशिंगटन अब बीजिंग के विकल्प के रूप में नई दिल्ली को एयरोस्पेस हब के रूप में खड़ा करना चाहता है। (इनपुट: ANI)