
डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड के लिए ग्लोबल गोल। ( फोटो: AI Generated)
Geopolitical Power Play: डोनाल्ड ट्रंप का 'मिशन ग्रीनलैंड' (Trump Greenland Policy) अब केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि दुनिया के लिए एक बड़ा आर्थिक खतरा बन गया है। रियल एस्टेट से ग्लोबल सिक्योरिटी तक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ( Donald Trump) ने एक बार फिर दुनिया को चौंकाते हुए डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा को आधिकारिक नीति (Geopolitical Power Play) में बदल दिया है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व अमेरिका के लिए जरूरी है, खासकर तब जब रूस और चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। लेकिन इस बार यह मामला केवल 'प्रस्ताव' तक सीमित नहीं है; ट्रंप ने इसे 'ग्लोबल ट्रेड वॉर' (US Europe Trade War) का हथियार बना लिया है। अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती इस तनातनी का असर आपकी जेब और भारत की इकोनॉमी (India Export Opportunities) पर कैसा होगा? जानिए इस रिपोर्ट में।
डोनाल्ड ट्रंप ने 17 जनवरी 2026 को घोषणा की कि जो भी देश ग्रीनलैंड सौदे का विरोध करेगा, उसे आर्थिक परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, यूके, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और नीदरलैंड से आने वाले सामान पर 10% आयात शुल्क (Tariff) लगा दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने साफ तौर पर कहा है कि अगर 1 जून 2026 तक ग्रीनलैंड की बिक्री पर कोई समझौता नहीं हुआ, तो यह टैरिफ बढ़ा कर 25% कर दिया जाएगा।
यूरोपीय संघ ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने स्पष्ट किया है कि "ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है," जबकि फ्रांस और जर्मनी ने इसे नाटो (NATO) की एकता के लिए खतरा माना है।
ग्रीनलैंड केवल बर्फ का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह खनिजों का खजाना है। यहां 'रेयर अर्थ मेटल्स' (Rare Earth Metals) के विशाल भंडार है, जिनका स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और सैन्य उपकरणों में इस्तेमाल होता है। वर्तमान में इन खनिजों पर चीन का एकाधिकार है, जिसे ट्रंप तोड़ना चाहते हैं। इसके अलावा, पिघलती बर्फ के कारण खुल रहे नए समुद्री मार्ग (Shipping Routes) व्यापार की दूरी को बहुत कम कर सकते हैं। दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का जो प्रस्ताव दिया है, उसके पीछे कोई रियल एस्टेट डील नहीं, बल्कि गहरी सामरिक चाल है। ग्रीनलैंड में 'रेयर अर्थ मेटल्स' (Rare Earth Metals) का विशाल भंडार है, जिनका स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी और घातक मिसाइलों को बनाने में इस्तेमाल होता है।
जब डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड बेचने से इनकार किया, तो ट्रंप ने अपनी पुरानी शैली में 'आर्थिक दंड' का सहारा लिया। उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और यूके जैसे 8 प्रमुख देशों पर 10% आयात शुल्क (Import Duty) लगा दिया है। इसका मतलब है कि अब इन देशों का सामान अमेरिका में महंगा बिकेगा, जिससे वैश्विक बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है।
हालांकि यह विवाद अमेरिका और यूरोप के बीच है, लेकिन एक वैश्विक शक्ति और उभरती अर्थव्यवस्था होने के नाते भारत इससे अछूता नहीं रहेगा:
निर्यात के नए अवसर: अगर अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापारिक रिश्ते बिगड़ते हैं, तो भारत के लिए अमेरिकी बाजार में अपनी पैठ बनाने का मौका होगा। खासकर टेक्सटाइल, फार्मास्युटिकल्स और आईटी सेक्टर में भारतीय कंपनियां यूरोपीय सामान की जगह ले सकती हैं।
महंगाई और शेयर बाजार: वैश्विक अनिश्चितता के कारण सोने और चांदी की कीमतों में उछाल आ सकता है। भारतीय शेयर बाजार में अल्पावधि (Short-term) में अस्थिरता देखी जा सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से 'इंडिया-ईयू मुक्त व्यापार समझौते' (FTA) को इससे गति मिल सकती है।
सामरिक संतुलन: भारत के रूस और अमेरिका दोनों के साथ गहरे रिश्ते हैं। आर्कटिक क्षेत्र में रूस की बढ़ती सक्रियता के बीच, अमेरिका का ग्रीनलैंड पर नियंत्रण भारत के लिए एक रणनीतिक संतुलन (Strategic Balance) पैदा कर सकता है, हालांकि नाटो में फूट भारत के लिए चिंता का विषय है।
आर्कटिक काउंसिल: भारत आर्कटिक काउंसिल का ऑब्जर्वर सदस्य है। इस क्षेत्र में होने वाला कोई भी भू-राजनीतिक बदलाव भारत के वैज्ञानिक मिशन और भविष्य के ऊर्जा समझौतों को प्रभावित करेगा।
निर्यात में इजाफा: अगर अमेरिकी बाजार में यूरोपीय सामान महंगा होता है, तो भारत के कपड़ा (Textiles) और आईटी सेक्टर के लिए वहां अपनी जगह बनाने का यह सबसे अच्छा मौका होगा।
महंगाई का खतरा: ग्लोबल ट्रेड वॉर की वजह से कच्चे तेल और सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव आ सकता है, जिससे भारत में आम आदमी के लिए बजट बिगड़ सकता है।
डेनमार्क: "ग्रीनलैंड की जनता और जमीन बिकाऊ नहीं है। यह प्रस्ताव लोकतंत्र और संप्रभुता का अपमान है।"
चीन: "अमेरिका जबरन दुनिया के संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है, हम इस विस्तारवाद के खिलाफ हैं।"
मार्केट एक्सपर्ट्स: जानकारों का मानना है कि अगर यह ट्रेड वॉर लंबी चली, तो 2026 के आखिर तक वैश्विक विकास दर 1.5% तक गिर सकती है।
आने वाले हफ्तों में ट्रंप प्रशासन और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बड़ी बैठकें प्रस्तावित हैं। अगर वार्ता विफल होती है, तो जून 2026 से ट्रंप इस टैक्स को बढ़ा कर 25% कर सकते हैं। साथ ही, नाटो (NATO) के अंदर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच सैन्य सहयोग पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं।
इस पूरी जंग का एक पहलू यह भी है कि रूस और चीन मिल कर 'आर्कटिक सिल्क रोड' बना रहे हैं। बात यह है कि पिघलती बर्फ के कारण समुद्री रास्ते छोटे हो रहे हैं। ट्रंप का ग्रीनलैंड प्रेम दरअसल रूस और चीन के उस बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश है, जो भविष्य में समुद्री व्यापार पर कब्जा कर सकते हैं।
Updated on:
18 Jan 2026 07:21 pm
Published on:
18 Jan 2026 07:20 pm
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