धार, Jun 07, 2026

भोजशाला में चुपके से स्थापित की गई अष्टधातु की वाग्देवी प्रतिमा (Photo Source- Patrika)
Bhojshala Security : मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और संवेदनशील भोजशाला परिसर में शनिवार को हुए एक अप्रत्याशित घटनाक्रम ने प्रशासन, पुरातत्व विभाग और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अज्ञात व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भोजशाला के गर्भगृह में मां वाग्देवी की अष्टधातु प्रतिमा स्थापित कर दी गई। आश्चर्यजनक बात ये रही कि, परिसर में तैनात सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी।
मामला शाम को एएसआई के संज्ञान में आने के बाद अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर प्रतिमा को हटवा दिया। घटना ऐसे समय सामने आई, जब हाल ही में उच्च न्यायालय द्वारा भोजशाला को सरस्वती मंदिर घोषित किए जाने और मुख्यमंत्री द्वारा यहां 'सरस्वती लोक' एवं राजा भोज शोध संस्थान की घोषणा के बाद परिसर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। ऐसे माहौल में प्रतिमा की अचानक स्थापना और फिर उसे हटाए जाने की घटना ने नई बहस छेड़ दी है।
जानकारी के अनुसार, शनिवार दोपहर भोजशाला परिसर में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही अपेक्षाकृत कम थी। इसी दौरान किसी व्यक्ति द्वारा गर्भगृह में अष्टधातु निर्मित मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित कर दी गई। प्रतिमा के समक्ष पुष्प, अक्षत और पूजन सामग्री भी रखी गई थी, जिससे स्पष्ट था कि स्थापना के बाद विधिवत पूजा-अर्चना भी की गई। शाम करीब साढ़े छह बजे जब यह जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारियों तक पहुंची तो तत्काल मौके पर पहुंचकर प्रतिमा को हटाया गया। हालांकि यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि प्रतिमा को परिसर में कौन लेकर आया, किसने स्थापित किया और सुरक्षा तंत्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल सकी।
भोजशाला की संवेदनशीलता को देखते हुए यहां बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू है। परिसर के बाहरी हिस्से में पुलिस चौकी और सुरक्षा बल तैनात रहते हैं, जबकि अंदर एएसआई के सुरक्षा गार्ड निगरानी करते हैं। इसके बावजूद अष्टधातु जैसी भारी धातु की प्रतिमा का परिसर में पहुंचना और गर्भगृह तक स्थापित हो जाना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि प्रतिमा स्थापना की पूरी प्रक्रिया गोपनीय तरीके से कैसे संपन्न हो गई और किसी अधिकारी या सुरक्षा कर्मी को इसकी भनक तक नहीं लगी।
घटनाक्रम के सामने आने के बाद भोज उत्सव समिति ने इस मामले से स्वयं को अलग बताते हुए किसी भी प्रकार की भूमिका से इनकार किया है। समिति की ओर से कोई अधिकृत बयान जारी नहीं किया गया, लेकिन संयोजक गोपाल शर्मा ने स्पष्ट किया कि समिति द्वारा पूर्व में स्थापित किए गए मां वाग्देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप का ही नियमित पूजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 17 मई को समिति द्वारा प्रतीकात्मक स्वरूप और मैहर की अखंड ज्योत स्थापित की गई थी। शनिवार को जो अष्टधातु प्रतिमा दिखाई दी, उससे समिति का कोई संबंध नहीं है।
भोजशाला को लेकर पिछले कुछ सप्ताह से घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। 15 मई को उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक परिसर को सरस्वती मंदिर के रूप में मान्यता दी थी। इसके बाद 25 मई को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने यहां सरस्वती लोक तथा राजा भोज शोध संस्थान विकसित करने की घोषणा की थी। इसी बीच मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को विदेश से वापस लाने की मांग भी लगातार उठ रही है। माना जाता है कि वाग्देवी की मूल प्रतिमा वर्तमान में लंदन के संग्रहालय में सुरक्षित है। ऐसे में अष्टधातु की प्रतिमा की स्थापना को कई लोग इन मांगों और हालिया घटनाओं से जोड़कर भी देख रहे हैं।
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इसी दिन दोपहर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरातत्व अधीक्षक डॉ. शिवाकांत बाजपेई भोजशाला पहुंचे थे। उन्होंने परिसर का विस्तृत निरीक्षण किया और सुरक्षा सहित विभिन्न व्यवस्थाओं का जायजा लिया। अधिकारियों ने हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप लागू व्यवस्थाओं और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा भी की। निरीक्षण के कुछ घंटे बाद ही प्रतिमा स्थापना का मामला सामने आना कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रहा है।
Published on: 07 Jun 2026 07:35 am

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