
UGC guidelines 2026 (PC: UGC)
UGC Equity Rules 2012 vs 2026: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत और अन्य भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026' नोटिफाई कर दिया है। यूजीसी के इन नए 'इक्विटी नियमों' ने उच्च शिक्षा जगत को दो धड़ों में बांट दिया है। 13 जनवरी, 2026 को जारी इन नए नियमों ने 2012 के पुराने ढांचे की जगह ली है। हालांकि, इन नियमों के लागू होते ही सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। जहां एक पक्ष इसे सुधारवादी कदम बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे एक विशेष वर्ग के खिलाफ हथियार के तौर पर देख रहा है। जानिए आखिर 2012 के मुकाबले 2026 के कानून में वो कौनसे बड़े बदलाव हुए जिनको लेकर सड़कों पर हैं छात्र।
आसान भाषा में समझिए यूजीसी के पुराने और नए नियमों के बीच के अंतर को जिसे लेकर हो रहा है देशभर में विरोध:
| पहलू | 2012 के नियम | 2026 के नए नियम |
|---|---|---|
| दायरा (Scope) | मुख्य रूप से केवल एससी और एसटी छात्र शामिल थे। | एससी, एसटी के साथ अब ओबीसी, अल्पसंख्यक, महिलाएं और स्टाफ भी शामिल। |
| संस्थानिक ढांचा | केवल एक एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर और सेल होता था। | इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वाड, एम्बेसडर और 24 घंटे हेल्पलाइन अनिवार्य। |
| शिकायत पर एक्शन | जांच के लिए कोई सख्त समय-सीमा तय नहीं थी। | 24 घंटे में कार्रवाई शुरू, 15 दिन में रिपोर्ट और 60 दिन में जांच पूरी। |
| जवाबदेही | नियम केवल सलाहकार प्रकृति के थे, सख्ती कम थी। | नियमों का पालन न करने पर फंड रुक सकता है और मान्यता भी छिन सकती है। |
| गलत शिकायत पर दंड | झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ प्रावधान थे। | नए नियमों में झूठी शिकायत पर कार्रवाई का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं है। |
2012 के नियमों के तहत केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्र ही शिकायत कर सकते थे। 2026 के नियमों में अब अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल कर लिया गया है। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों का कहना है कि इससे भेदभाव कम होने के बजाय कैंपस में गुटबाजी और बढ़ेगी। सोशल मीडिया पर 'रोलबैक यूजीसी' ट्रेंड कर रहा है, जिसमें आरोप लगाया जा रहा है कि नए नियमों के तहत बिना पर्याप्त सबूत के भी सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाया जा सकता है।
यूजीसी का कहना है कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लाए गए हैं। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला और मुंबई की पायल तड़वी के मामले के बाद अदालत ने भेदभाव रोकने के लिए सख्त व्यवस्था बनाने के आदेश दिए थे। कोर्ट के आदेश के बाद ही फरवरी 2025 में ड्राफ्ट तैयार किया गया और अब इसे पूरी तरह लागू कर दिया गया है।
मौजूदा हालातों को देखते हुए लगता है कि, सरकार और यूजीसी प्रदर्शनकारी छात्रों व विशेषज्ञों के साथ संवाद करें। यदि इन नियमों में संतुलन नहीं बनाया गया, तो इन सबका असर शिक्षण संस्थानों के अकादमिक माहौल पर पड़ेगा। आने वाले समय में यह देखना जरूरी होगा कि, क्या केंद्र सरकार इन विवादित बिंदुओं पर कोई संशोधन करती है या फिर ये नियम इसी स्वरूप में लागू रहेंगे।
Published on:
28 Jan 2026 06:15 pm

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