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ग्रेटर नोएडा, Jun 01, 2026

अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, नगर निकायों को दो टूक- “सिर्फ सर्वे नहीं, दोषियों पर एक्शन दिखाएं”

सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण और लैंड यूज नियमों के उल्लंघन के मामले में JDA)की गैरहाजिरी पर सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने जेडीए को कड़ी फटकार लगाते हुए सभी विकास प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वह सिर्फ सर्वे न करें, बल्कि दोषियों पर की गई वास्तविक कार्रवाई का पूरा ब्यौरा पेश करें।

Supreme court strict on illegal construction and land use violation

देशभर में अवैध निर्माण, भूमि उपयोग नियमों के उल्लंघन और भवन उपविधियों के पालन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) की गैरहाजिरी पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि जेडीए ने न तो मामले में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और न ही कोई शपथपत्र दाखिल किया।

20 मई को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने न्यायालय मित्र (एमिकस क्यूरी) अजीत कुमार सिन्हा की ओर से दी गई जानकारी पर गौर किया। सिन्हा ने अदालत को बताया कि जयपुर में नगर नियोजन और भूमि उपयोग विनियमन की जिम्मेदार संस्था होने के बावजूद जेडीए अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें जयपुर के नागरिकों से गंभीर अनियमितताओं संबंधी कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं। अदालत ने इनमें से एक शिकायत को परीक्षण और आवश्यक कार्रवाई के लिए न्यायालय मित्र को भेजने के निर्देश दिए।

पीठ ने स्पष्ट किया कि नगर नियोजन, भवन मानचित्र स्वीकृति, भवन उपविधियों के प्रवर्तन और भूमि उपयोग नियंत्रण से जुड़ी जिम्मेदार एजेंसियों को न्यायालयीन कार्यवाही में जवाब देना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता कि मामले में किसी अन्य एजेंसी, जैसे नगर निगम, को पक्षकार बनाया गया है।

यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट देशभर में अवैध निर्माण और भूमि उपयोग में अवैध बदलावों पर रोक लगाने संबंधी अपने निर्देशों के अनुपालन की निगरानी कर रहा है। सुनवाई के दौरान न्यायालय मित्र ने बताया कि विभिन्न प्राधिकरणों द्वारा दाखिल शपथपत्रों में मुख्य रूप से सर्वेक्षणों के जरिए उल्लंघनों की पहचान का उल्लेख है, लेकिन दोषियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया।

अदालत ने कहा कि उसके समक्ष प्रस्तुत सामग्री से देश के विभिन्न हिस्सों में स्वीकृत मानचित्रों और नियोजन मानकों से विचलन को लेकर व्यापक चिंताएं सामने आई हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पीठ ने सभी संबंधित पक्षों को नए शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए, जिनमें सर्वेक्षण के बाद की गई वास्तविक कार्रवाई का पूरा ब्यौरा हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शपथपत्र संबंधित प्राधिकरणों के प्रमुख अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से सत्यापित किए जाएं और उनमें सीलिंग, ध्वस्तीकरण अथवा कानून के तहत की गई अन्य कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख हो। अदालत ने दो टूक कहा कि केवल सर्वेक्षण कर उल्लंघनों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावी प्रवर्तन कार्रवाई भी दिखानी होगी।

पीठ ने अवैध निर्माण, भूमि उपयोग उल्लंघन और संबंधित विवादों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले वैधानिक अपीलीय प्राधिकरणों तथा अर्ध-न्यायिक मंचों को भी निर्देश दिया कि लंबित मामलों का यथासंभव तीन माह के भीतर निस्तारण किया जाए।

मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित है। उस दिन सुप्रीम कोर्ट देशभर के शहरी विकास, नियोजन और नगर निकायों द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा करेगा, जिनमें वे प्राधिकरण भी शामिल होंगे जिनकी ओर से अब तक जवाब लंबित है।

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