
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने जेसी मिल्स लिमिटेड से जुड़े बहुचर्चित परिसमापन प्रकरण में जमीन के स्वामित्व और राजस्व रिकॉर्ड में की गई प्रविष्टियों को लेकर सख्त टिप्पणी की है। 28 जनवरी 2026 को पारित आदेश में स्पष्ट कहा कि म्यूटेशन प्रविष्टियां केवल राजस्व प्रयोजन के लिए होती हैं, वे किसी भी स्थिति में मालिकाना हक का दस्तावेज नहीं मानी जा सकतीं हैं। बार-बार समझाने के बाद भी वही दलीलें दी जा रीह हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। 4 फरवरी 2026 को सुबह 10:30 बजे तय की है
दरअसल मामला जेसी मिल की संपत्तियों विवाद से जुड़ा है। जेसी मिल व मजदूरों, बैंकों के बीच देनदारी को लेकर हाईकोर्ट में याचिका लंबित है। जिसमें जेसी मिल्स की परिसंपत्तियों के परिसमापन की कार्यवाही चल रही है। सुनवाई के दौरान यूको बैंक की ओर से हस्तक्षेप आवेदन पर विचार किया गया। यूको बैंक की ओर से यह दलील दी गई कि परिसमापक के निर्देश पर यह आवेदन दायर किया गया है। बताया गया कि परिसमापक ने 19 अगस्त 2024 को नायब तहसीलदार, लश्कर, ग्वालियर को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई थी। आपत्ति इस बात पर थी कि नायब तहसीलदार ने सर्वे नंबर 376, 383, 386 से 391, 395/1, 396, 427, 430 और 482, कुल 22.597 हेक्टेयर भूमि को शासकीय भूमि के रूप में दर्ज कर दिया। सुनवाई के दौरान यूको बैंक के अधिवक्ता यह स्पष्ट नहीं कर सके कि विवादित भूमि में से कौन-सी जमीन जेसी मिल्स की स्वामित्व वाली थी, कौन-सी राज्य सरकार द्वारा लीज पर दी गई थी और कौन-सी जमीन कस्टम विभाग के नाम दर्ज थी। इसके अलावा यह भी स्पष्ट नहीं किया जा सका कि कस्टम विभाग के नाम दर्ज जमीन पर उसका वास्तविक स्वामित्व है या नहीं। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना मालिकाना हक का प्रमाण नहीं है, इसके बावजूद इस तरह की दलीलें दी जा रही हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
-कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट न होने पर यूको बैंक के अधिवक्ता को एक सप्ताह का समय देते हुए निर्देश दिए कि वे अपने आवेदन में संशोधन कर यह स्पष्ट करें कि कौन-सी जमीन जेसी मिल्स ने वैध रूप से खरीदी थी। कौन-सी जमीन राज्य सरकार ने लीज पर दी थी। कस्टम विभाग के नाम दर्ज जमीन पर उसका स्वामित्व किस आधार पर है। साथ ही यह भी बताने को कहा गया कि जेसी मिल्स किस परिस्थिति में कस्टम विभाग के नाम दर्ज जमीन के कब्जे में आई।
-इसी प्रकरण में जेसी मिल्स के सेवानिवृत्त कर्मचारी केसी. वर्मा द्वारा दायर आवेदन पर भी सुनवाई हुई। वर्मा ने परिसमापक को उनके बकाया भुगतान के निर्देश देने की मांग की। हालांकि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि अभी तक किसी भी दावेदार, यहां तक कि सुरक्षित लेनदारों को भी एक पैसा नहीं मिला है। श्रमिकों का पहला अधिकार होता है, न कि सुरक्षित लेनदारों का। इस पर कोर्ट ने फिलहाल इस दलील को स्वीकार नहीं किया। बाद में वर्मा ने अपने पक्ष के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
Published on:
30 Jan 2026 11:24 am
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