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172 कर्मचारियों का अमला, करोड़ों का खर्च फिर भी कार्यालय से 200 मीटर का अतिक्रमण नहीं हटा पा रहा नगर निगम

शहर को अतिक्रमण मुक्त करने के दावे करने वाला नगर निगम खुद अपने ही मदाखलत कार्यालय से महज 200 मीटर के दायरे से अतिक्रमण हटाने में नाकाम साबित हो रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि निगम के भारी-भरकम अमले, संसाधनों और हर साल होने वाले दो करोड़ रुपए से अधिक के खर्च के […]

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nagar nigam madakhalat office

नगर निगम अमले के पास 172 कर्मचारी होने के बाद भी महाराज बाड़े पर सजा फुटपाथ।

शहर को अतिक्रमण मुक्त करने के दावे करने वाला नगर निगम खुद अपने ही मदाखलत कार्यालय से महज 200 मीटर के दायरे से अतिक्रमण हटाने में नाकाम साबित हो रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि निगम के भारी-भरकम अमले, संसाधनों और हर साल होने वाले दो करोड़ रुपए से अधिक के खर्च के बावजूद शहर की सडक़े, फुटपाथ, नालियां और ग्रीन बेल्ट कब्जों से पटी पड़ी हैं। नगर निगम के मदाखलत विभाग के पास 172 कर्मचारियों का अमला, चार आयशर वाहन, दो ट्रैक्टर, दो क्रेन, दो डंपर और तीन एंबुलेंस सहित करीब 15 वाहन उपलब्ध हैं। कर्मचारियों के वेतन, डीजल, मरम्मत और अन्य मदों पर हर साल दो करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जा रहे हैं। इसके बाद भी हालात यह हैं कि अतिक्रमण विभाग के आसपास ही रोज नए कब्जे खड़े हो रहे हैं। विडंबना यह है कि निगम रोजाना 8 से 10 स्थानों पर अतिक्रमण हटाने का दावा करता है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। हटाए गए अतिक्रमण कुछ घंटों या दिनों में फिर उसी जगह दोबारा खड़े हो जाते हैं और निगम मूकदर्शक बना रहता है।

मुख्य सडक़ों से लेकर ग्रीन बेल्ट तक कब्जे
शहर की कोई ऐसी सडक़ नहीं बची, जहां अतिक्रमण न हो। मुख्य सडक़ों, ग्रीन बेल्ट और नालियों तक पर कब्जे कर लिए गए हैं। एनजीटी और कलेक्टर स्तर से कई बार सख्त निर्देश और फटकार लगने के बावजूद निगम अफसरों की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया। कंपू, अस्पताल रोड, सिटी सेंटर, कटोराताल, फूलबाग, किला गेट, थाटीपुर, बड़ा गांव खुरैरी, शिंदे की छावनी, नाकाचंद्रवदनी, झांसी रोड, एबी रोड गोलपहाडिय़ा, गिरवाई सहित शहर की अधिकांश प्रमुख सडक़े कब्जेधारियों के हवाले हैं। दक्षिण और ग्वालियर विधानसभा क्षेत्र की लगभग हर गली और नाली पर अतिक्रमण स्थायी रूप ले चुका है।

अतिक्रमण न हटाने के लिए बहानों की फेहरिस्त
नगर निगम के अफसर अपनी नाकामी छिपाने के लिए बहानों की लंबी सूची गिनाते हैं अतिक्रमण हटाने के लिए संसाधनों की कमी, जिला प्रशासन, निगम और पुलिस के बीच समन्वय का अभाव,सरकार की ठोस अतिक्रमण नीति का न होना, जब्त सामान रखने के लिए स्टोर की कमी,जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दबाव, पार्षदों और अफसरों की कथित सांठगांठ अमले की कमी है। हालांकि सवाल यह है कि जब 172 कर्मचारी, दर्जनों वाहन और करोड़ों का बजट मौजूद है, तो फिर यह कमी आखिर किस बात की है

40 कर्मचारी नेताओं की सेवा में, शहर भगवान भरोसे
मदाखलत विभाग में उपायुक्त, नोडल अधिकारी, विधानसभावार अधिकारी, निरीक्षक सहित 100 विनियमित और 72 आउटसोर्स कर्मचारी तैनात हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि करीब 40 कर्मचारी अतिक्रमण हटाने की बजाय दूसरे विभागों या नेताओं और जनप्रतिनिधियों के यहां सेवाएं दे रहे हैं। यानी जिन कर्मचारियों को सडक़ और फुटपाथ खाली कराने की जिम्मेदारी है, वे सत्ता के गलियारों में व्यस्त हैं।

सवालों के घेरे में निगम की नीयत
शहरवासियों के लिए सवाल साफ है जब नगर निगम अपने ही कार्यालय के आसपास से अतिक्रमण नहीं हटा पा रहा, तो पूरे शहर को अतिक्रमण मुक्त करने का दावा कितना खोखला है। क्या करोड़ों रुपए का खर्च सिर्फ कागजी कार्रवाई और दिखावटी अभियानों के लिए हो रहा है या फिर अतिक्रमण के इस खेल में जिम्मेदारों की मिलीभगत से शहर को जानबूझकर जकड़ा जा रहा है। शहर अतिक्रमण से कराह रहा है, लेकिन जिम्मेदारों की चुप्पी साफ इशारा कर रही है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की खुली विफलता है।