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संपादकीय: संवेदनशीलता से थामना होगा बच्चों का हाथ

ऑनलाइन गेमिंग कंपनियां यह जानती हैं कि उनका बड़ा बाजार बच्चे और किशोर हैं, फिर भी वे उम्र-सीमा, समय-सीमा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को गंभीरता से नहीं लेतीं।

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ANUJ SHARMA - तकनीक जिस गति से हमारे जीवन में घुसी है, वैसे इसके दुष्प्रभावों से निपटने की तैयारी नहीं हुई। गाजियाबाद में एक ही परिवार की तीन नाबालिग बहनों की मौत की खबर समूचे समाज को झकझोरने वाली है। यह घटना सिर्फ एक परिवार पर आई त्रासदी नहीं है, बल्कि डिजिटल दौर में बच्चों के सामने खड़े होते जा रहे बड़े खतरे को लेकर चेतावनी भी है। ऑनलाइन गेमिंग की आदी इन बहनों का स्कूल भी नियमित नहीं हो रहा था। चिंता यह है कि बच्चे अब स्क्रीन के सहारे अपनी दुनिया गढऩे लगे हैं। ऑनलाइन गेमिंग आज महज मनोरंजन का साधन ही नहीं रह गई है।


यह एक ऐसा उद्योग बन चुका है, जो बच्चों और किशोरों की मानसिक कमजोरियों को पहचानकर उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन से बांधे रखने की रणनीति पर काम करता है। इन खेलों की बनावट ही ऐसी होती है कि खिलाड़ी बार-बार लौटने को मजबूर हो जाता है। लेवल, रिवॉर्ड, वर्चुअल करेंसी और लगातार मिलने वाली चुनौतियां दिमाग में एक तरह की लत पैदा करती है। बच्चों के लिए यह खतरा और भी बड़ा है, क्योंकि उनका मानसिक विकास अभी अधूरा होता है और वे जोखिम का आकलन करने में सक्षम नहीं होते। दरअसल, कोरोनाकाल केे बाद यह समस्या और गहरा गई। स्कूल बंद हुए, खेल के मैदान सूने हो गए और बच्चों का सामाजिक दायरा सिमटकर मोबाइल स्क्रीन तक रह गया। कई परिवारों ने हालात की मजबूरी में बच्चों को फोन और टैबलेट थमा दिए, ताकि वे घर में व्यस्त रहें। लेकिन धीरे-धीरे यही सुविधा लत में बदलती चली गई। आज, जो बच्चे घंटों तक ऑनलाइन गेम में डूबे रहते हैं उनका वास्तविक दुनिया से रिश्ता कमजोर होता जा रहा है। बड़ा सवाल जिम्मेदारी का है। क्या केवल अभिभावक जिम्मेदार हैं? या वह व्यवस्था भी, जो मुनाफे की अंधी दौड़ में बच्चों को उपभोक्ता की तरह देखने लगी है? ऑनलाइन गेमिंग कंपनियां यह जानती हैं कि उनका बड़ा बाजार बच्चे और किशोर हैं, फिर भी वे उम्र-सीमा, समय-सीमा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को गंभीरता से नहीं लेतीं। स्व-नियमन की बातें अक्सर कागजों तक सीमित रह जाती हैं। दुनिया के कई देशों ने खतरे को समझते हुए सख्त कदम उठाए हैं। साफ है कि जब सरकारें सख्ती दिखाती हैं, तभी कंपनियां जिम्मेदारी से नियम बनाती हैं।


भारत में भी अब ठोस और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सलाह और जागरूकता अभियान काफी नहीं, बल्कि स्पष्ट कानून, निगरानी और दंड का प्रावधान जरूरी है। साथ ही, अभिभावकों की भूमिका भी बेहद अहम है। बच्चों के व्यवहार में बदलाव, चिड़चिड़ापन या एकांतप्रियता जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना होगा। उन्हें खेल, कला, पढ़ाई और परिवार के साथ समय बिताने के अवसर भी देने होंगे। बच्चों को तकनीक के भरोसे नहीं छोड़ें, बल्कि संवेदनशीलता के साथ उनका हाथ थामें।