18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

icon

वीडियो

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

‘समाज में करप्शन, जज भी यहीं से आते हैं, जवाबदेही के लिए एफिशिएंट सिस्टम चाहिए’, JLF में बोले पूर्व CJI चंद्रचूड़

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) के ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सेशन में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने न्याय, जवाबदेही और बदलते समाज पर खुलकर बात की।

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Aman Pandey

Jan 18, 2026

“मैं बेबी बूमर पीढ़ी से हूं, लेकिन मेरी दो बेटियां स्पेशल नीड्स वाली हैं और जेन-Z हैं। अगर मुझे उनकी जिंदगी से जुड़े रहना है, तो मुझे जेन-Z के काम करने का तरीका अपनाना होगा।” ये बातें पूर्व CJI ने पत्रिका की ओर से आयोजित ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सेशन में कहीं। उन्होंने इसे सिर्फ पारिवारिक अनुभव नहीं, बल्कि संस्थानों के लिए भी सीख बताया। कहा कि बदलाव को समझे बिना प्रासंगिक बने रहना मुश्किल है।

सत्र की शुरुआत उमर खालिद से जुड़े मामले के संदर्भ में हुए सवाल से हुई, जिस पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि भारतीय कानून की बुनियाद "निर्दोषता की धारणा" पर टिकी है और किसी भी आरोपी को दोषी सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्री-ट्रायल जमानत सजा का विकल्प नहीं हो सकती। यदि कोई व्यक्ति पांच या सात वर्ष तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे और अंत में बरी हो जाए तो उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई संभव नहीं है।

उन्होंने बताया कि बेल न देने के तीन प्रमुख अपवाद हैं। आरोपी समाज में दोबारा गंभीर अपराध कर सकता हो। ट्रायल से भागने की आशंका हो। सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा हो। इनके अलावा बेल नियम है, अपवाद नहीं।

नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर चिंता

पूर्व CJI ने कहा कि समस्या तब आती है जब नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कानून इनॉसेंस को गिल्ट से रिप्लेस कर देते हैं। कोर्ट को देखना चाहिए कि क्या वाकई नेशनल सिक्योरिटी इन्वॉल्व है और क्या डिटेंशन प्रोपोर्शनल है। वरना लोग सालों जेल में सड़ते रहते हैं।

उन्होंने याद दिलाया कि अगर ट्रायल उचित समय में पूरा नहीं होता, तो यह आर्टिकल 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। “संविधान सुप्रीम है, कोई कानून नहीं।”

ट्रायल कोर्ट पर दबाव और सुप्रीम कोर्ट पर बोझ

चंद्रचूड़ ने जिला और हाईकोर्ट में बेल न देने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट पहला इंटरफेस है, लेकिन वहां डर का माहौल है। जज सोचते हैं-बेल दी तो नीयत पर सवाल उठेंगे। नतीजा ये है कि हर मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है। उन्होंने बताया कि इसी कारण सुप्रीम कोर्ट पर सालाना करीब 70 हजार केस आ रहे हैं।

फैसलों की भाषा और ‘फ्लोरिश’

समलैंगिकता को अपराधमुक्त करने वाले ऐतिहासिक फैसले का जिक्र करते हुए पूर्व CJI ने बताया कि उस वक्त उन्हें कवि-गायक लियोनार्ड कोहेन का ‘डेमोक्रेसी इन सम डेंजर’ वाला कोट याद आया। उन्होंने कहा कि कुछ फैसले बीच रोड पर लिखे जाते हैं, कुछ में थोड़ा फ्लोरिश डालते हैं। मुझे लगा, यह फैसला फ्लोरिश वाला होना चाहिए।

‘जज समाज से आते हैं, लेकिन उनसे ऊंची अपेक्षा’

भ्रष्टाचार पर बोलते हुए चंद्रचूड़ ने संतुलित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि जज भी उसी समाज से आते हैं, जहां करप्शन मौजूद है, लेकिन उनसे हायर कॉलिंग की अपेक्षा होती है। मैं भ्रष्टाचार को जस्टिफाई नहीं कर रहा, लेकिन हर गलत फैसले को करप्शन कह देना आसान है। सच तक पहुंचना ज्यादा जरूरी है। करप्शन रोकने के लिए जवाबदेही तय करने वाला एफिशिएंट सिस्टम चाहिए।