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बेतहाशा मेडिकल सीटों के लिए गुणवत्ता से न हो समझौता

ऐसा समझौता जन-स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ही साबित होगा। आंकड़े बताते हैं कि कई सरकारी मेडिकल कॉलेज 30 प्रतिशत तक रिक्त फैकल्टी पदों के साथ काम कर रहे हैं। कई प्राइवेट कॉलेज में केवल कागजों पर शिक्षकों का नाम चल रहा है।

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डॉ.शुभकाम आर्य, वरिष्ठ चिकित्सक - इस साल के केंद्रीय बजट में सरकार ने अगले पांच वर्षों में 75 हजार नई मेडिकल सीटें जोडऩे का लक्ष्य रखा है, जिसमें से लगभग 10 हजार नई सीटें तो इसी शैक्षणिक वर्ष (2026-27) में बढ़ाने की योजना है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा की गुणवत्ता, प्रशिक्षित फैकल्टी और तकनीकी संसाधनों का समुचित विकास सुनिश्चित करने पर ही यह वृद्धि अधिक सार्थक होगी।वैसे भी भारत में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में हाल के वर्षों में आई संख्यात्मक छलांग ने अब एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां एक ओर आंकड़ों की चमक तो है, लेकिन धरातल पर गिरती शैक्षणिक गुणवत्ता और भारी-भरकम फीस के बावजूद भविष्य के रोजगार का गहराता संकट चिंताएं खड़ी कर रहा है। देश में अभी मेडिकल कॉलेज 820 से अधिक हो चुके हैं। एमबीबीएस सीटें लगभग 1 लाख 30 हजार हो चुकी हैं। हर जिले में सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना ने इस विस्तार को गति दी है।

रिपोट्र्स के अनुसार भारत में प्रति 811 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है (पंजीकृत एलोपैथिक और आयुष चिकित्सकों की 80 फीसदी उपलब्धता मानते हुए)। यह अनुपात आदर्श माने जाने वाले मानक एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर से बेहतर है। कई नए कॉलेज, बुनियादी आवश्यकताओं जैसे पर्याप्त रोगी भार, अत्याधुनिक उपकरण और सबसे महत्वपूर्ण योग्य फैकल्टी को पूरा नहीं करते। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जब चिकित्सकों की संख्या पहले ही पर्याप्त है, तो इस बेतहाशा वृद्धि के लिए गुणवत्ता से समझौता करने का औचित्य क्या है? गुणवत्ता से समझौते का सबसे चिंताजनक उदाहरण हाल ही नीट-पीजी 2025 के संदर्भ में सामने आया है, जहां पीजी की खाली सीटों को भरने के दबाव में कट-ऑफ को इस हद तक गिरा दिया गया कि माइनस 40 अंक लाने वाले अभ्यर्थी भी अब विशेषज्ञ डॉक्टर बनने के योग्य हो गए हैं! मेरिट में चयन के आधार में इस तरह की मजबूरी आखिर क्यों? यह तो सीधे तौर पर भविष्य के विशेषज्ञ चिकित्सकों की दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ऐसा समझौता जन-स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ही साबित होगा। आंकड़े बताते हैं कि कई सरकारी मेडिकल कॉलेज 30 प्रतिशत तक रिक्त फैकल्टी पदों के साथ काम कर रहे हैं। कई प्राइवेट कॉलेज में केवल कागजों पर शिक्षकों का नाम चल रहा है।

अपर्याप्त शिक्षण और सीमित रोगी भार वाले संस्थानों से निकलने वाले चिकित्सकों को वह गहन और व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिल पाता जो इस पेशे की रीढ़ है। मानक से ज्यादा चिकित्सक तैयार करना, खासकर जब यह शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करके हो, तो आने वाले समय में नौकरी की अनिश्चितता मुश्किल खड़ी कर सकती है। फिर निजी कॉलेजों और सरकारी कॉलेजों के मैनेजमेंट कोटे में एमबीबीएस कोर्स की फीस 50 लाख से 1.25 करोड़ रुपए तक पहुंच रही है। आज सिर्फ एमबीबीएस से काम नहीं चलता। पीजी में मैनेजमेंट कोटे की बात करें तो फीस सीधे करोड़ों में है।
हमें संख्याबल नहीं, बल्कि दक्षता की सुनिश्चितता चाहिए। चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता से समझौता, आगे चलकर समाज के स्वास्थ्य के साथ समझौता है। यदि उच्च गुणवत्ता के तय मानकों को जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू नहीं किया गया और केवल संख्या बढ़ाने पर ही जोर रहा, तो हमारे डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात में सुधार होने के बावजूद चिकित्सा सेवा का स्तर गिरना तय है, जिसकी कीमत हम सबको चुकानी पड़ेगी।