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पत्रिका बना टेक्स्ट बुक; स्कूलों में पढ़ाया ट्रैफिक सेंस, राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक गूंजा…’बाएं से नहीं, दाएं से चलो’

Rules of road safety: सड़क हादसों में कमी लाने के लिए पत्रिका की ओर से छेड़ी गई मुहिम 'बाएं से नहीं, दाएं चली ऐ भाई! अब जन-जागरूकता आंदोलन का रूप ले चुकी है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, मेटा एआइ

प्रतीकात्मक तस्वीर, मेटा एआइ

Rules of road safety: सड़क हादसों में कमी लाने के लिए पत्रिका की ओर से छेड़ी गई मुहिम 'बाएं से नहीं, दाएं चली ऐ भाई! अब जन-जागरूकता आंदोलन का रूप ले चुकी है। इस अभियान का असर स्कूलों में भी देखने को मिल रहा है, जहां शिक्षक इसे ट्रैफिक सेंस के एक अनिवार्य पाठ की तरह पढ़ा रहे है।

राजस्थान के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कैमला, करोली और मध्यप्रदेश के शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, झारडा, उज्जैन में मंगलवार को इस अभियान की अनूठी तस्वीर देखने को मिली। कैमला व उज्जैन के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों ने पत्रिका की खबर को भी 'टीचिंग टूल' बना लिया। कक्षाओं में पत्रिका की प्रति दिखाते हुए बताया कि पैदल चलने वालों के लिए 'कीप लेफ्ट' (बाएं चलो) का नियम जानलेवा हो सकता है।

शिक्षकों ने बताया कि जब हम बाएं चलते हैं, तो गाड़ियां हमारे पीछे से आती है, जिससे हम उन्हें देख नहीं पाते और हादसे का शिकार हो जाते है। वहीं, 'दाएं चलने' पर सामने से आ रही गाड़ी दिखाई देती है और बचने का समय मिल जाता है।

अखबार बना जागरूकता का जरिया

पत्रिका की खबर पढ़ने के बाद बच्चों ने न केवल खुद इस नियम को अपनाने का संकल्प लिया, बल्कि परिवार और आस-पास के लोगों को गलत साइड नहीं चलेंगे पर हमेशा बाएं चलना ही सही है, लेकिन आज पता चला कि पैदल चलने वालों को बाएं चलना चाहिए ताकि सामने से आती गाडी दिख सके। अब मैं स्कूल आते-जाते समय इसी नियम का पालन करूंगी और मम्मी-पापा को भी बताऊंगी। -संध्या शर्मा, कक्षा 11. उज्जैन

तो कम होंगे हादसे

बचपन में विकसित ट्रैफिक सेंस भविष्य में हादसों को रोकने में कारगर होगा। दाएं चलने का तर्क बच्चों को समझ आ गया है। यह खबर नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का पाठ है।
-प्रीति अवस्थी, लेक्चरर, रा.उ.मा. विद्यालय कैमला करौली)