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निगहबान- जिम्मेदारों की आंखों में ‘मिर्च’

कुछ वर्ष पहले तक ड्रग्स और नशे की लत को मेट्रो शहरों की समस्या माना जाता था। यह बड़े शहर, क्लब संस्कृति और उच्च वर्ग तक ही यह सीमित था लेकिन आज तस्वीर भयावह रूप से बदल चुकी है।

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संदीप पुरोहित
समझाइश-आगाह-चेतावनी का समय बीत चुका है। अब तो खतरे के निशान को पार हो गया है। ड्रग्स का फलता-फूलता कारोबार नई पीढी को अपने जाल में जकड़ता जा रहा है। शासन प्रशासन और पुलिस ड्रग्स की छोटी मोटी बरामदगी पर आए दिन अपनी पीठ ठोकती नजर आती है। इन फौरी कार्रवाइयाें से कुछ नहीं होने वाला है। कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक इच्छा शक्ति भी कमजोर है। आधे अधूरे प्रयास कभी लक्ष्य नही प्राप्त कर पाते हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को बचाने की जंग है।

कुछ वर्ष पहले तक ड्रग्स और नशे की लत को मेट्रो शहरों की समस्या माना जाता था। यह बड़े शहर, क्लब संस्कृति और उच्च वर्ग तक ही यह सीमित था लेकिन आज तस्वीर भयावह रूप से बदल चुकी है। ड्रग्स ने न सिर्फ छोटे शहरों बल्कि गांवों और ढाणियों तक अपनी जड़ें फैला ली हैं। युवा तेज़ी से इस दलदल में धंसते जा रहे हैं और हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर होते जा रहे हैं।

स्मैक और रासायनिक पदार्थों से तैयार सिंथेटिक ड्रग्स-खासकर मेफेड्रॉन (एमडी)-इस संकट को और घातक बना रहे हैं। यह नशा जानलेवा है, लेकिन इसके बावजूद इसकी सप्लाई और खपत थमने का नाम नहीं ले रही। चिंता की बात यह है कि ड्रग्स तस्कर अब पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की सोच से कई कदम आगे निकल चुके हैं। नशे की तस्करी के लिए वे लगातार नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं।

हाल ही मंडलनाथ क्षेत्र में कार के दोनों दरवाजों के बीच बनाई गई सीक्रेट कैविटी से 28 किलो अफीम का दूध बरामद होना इसका उदाहरण है। इसी तरह 25 जनवरी को जेडीए सर्कल के पास मोटरसाइकिल सवार दो युवकों से एक किलो एमडी ड्रग्स की बरामदगी ने चौंका दिया। यह ड्रग्स बेंगलूरु की लैब में बनी थी और सप्लाई जोधपुर तक पहुंचाई गई थी। यह साफ संकेत है कि ड्रग्स का नेटवर्क अंतरराज्यीय ही नहीं, संगठित और तकनीकी रूप से बेहद सक्षम हो चुका है।

ड्रग्स सप्लाई के तौर-तरीकों में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले तस्कर अपनी निजी गाड़ियों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब उनके सहयोगी कोरियर बनकर लोक परिवहन का दुरुपयोग कर रहे हैं। बसों और रेलगाड़ियों में ड्रग्स भेजी जा रही है। बस परिवहन तस्करों के लिए सबसे सस्ता, तेज़ और सुरक्षित माध्यम बन गया है, जहां पार्सल के नाम पर कुछ भी देश के किसी भी कोने में पहुंचाया जा सकता है।

पार्सल का भी खूब खेल खेला जा रहा है। हमारे मरुस्थल की मथानिया की मिर्च दुनिया में मशहूर है। तस्करों ने इसको भी नहीं बख्शा। इसके पार्सल में ड्रग्स सप्लाई हो गई। तस्कर शासन-प्रशासन की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। मथानिया की मिर्च जैसे पार्सलों में उन्हें ड्रग दिखाई नहीं देती।

बीते 21 महीनों में एमडी ड्रग्स बनाने की आधा दर्जन से अधिक लैब पकड़ी जा चुकी हैं। यह तथ्य और भी डराता है कि रेतीले धोरों में-जहां सामान्य इंसान का रहना मुश्किल है-वहां एक के बाद एक सिंथेटिक ड्रग्स की लैब संचालित की जा रही थीं। भारी मात्रा में केमिकल और तैयार ड्रग्स की बरामदगी इस बात का सबूत है कि तस्करों ने पश्चिमी राजस्थान को सुरक्षित ठिकाने के रूप में चुन लिया है। इनमें से अधिकांश तस्कर वे हैं, जो मेट्रो शहरों में पुलिस की सख्ती के बाद वहां से भागे हैं। रेगिस्तानी इलाकों की भौगोलिक चुनौती और निगरानी की कमी उन्हें सुरक्षा देती है। अगर इनको जड़ मूल से नहीं उखाड़ा गया तो परिणाम भयावह होंगे।

सरकार, प्रशासन और जिम्मेदार विभागों को अब टुकड़ों में की जाने वाली कार्रवाई से ऊपर उठना होगा। यह लड़ाई केवल बरामदगी की नहीं, बल्कि सप्लाई चेन तोड़ने, युवाओं में जागरूकता फैलाने और नशे की ओर धकेलने वाले सामाजिक-आर्थिक कारणों पर चोट करने की है। स्कूल, कॉलेज, परिवार और समाज—सभी को इसमें भागीदार बनाना होगा। अब भी अगर सख्ती नही की तो भविष्य खोखला हो जाएगा। राजस्थान, विशेषकर पश्चिमी राजस्थान, कहीं ‘उड़ता पंजाब’ की राह पर न चल पड़े। जिम्मेदारों को जागना होगा। अपने निर्धारित किरदार के साथ न्याय करना होगा वर्ना…।