
गुलाब-जामुन का शहर: मैगलगंज की मिठास, आजादी से पहले शुरू हुई एक ऐतिहासिक विरासत (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )
Ritesh Singh
Taste of UP Lakhimpur Kheri: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित एक छोटा-सा कस्बा मैगलगंज, आज पूरे प्रदेश में अपनी एक खास पहचान बना चुका है। यह पहचान किसी किले, मंदिर या ऐतिहासिक इमारत से नहीं, बल्कि एक मिठाई से जुड़ी है,गुलाब-जामुन। यही वजह है कि मैगलगंज को अब लोग प्यार से ‘गुलाब-जामुन का शहर’ कहने लगे हैं। कस्बे में दाखिल होते ही एक तेज़, मीठी-सी खुशबू हर आने-जाने वाले को अपनी ओर खींच लेती है। सड़क किनारे लगे बोर्ड पर लिखा होता है-मैगलगंज में आपका स्वागत है, गुलाब-जामुन खाकर जाइएगा।”और सच कहें तो, यहां से बिना गुलाब-जामुन खाए लौटना लगभग नामुमकिन है।
मैगलगंज के मुख्य चौराहे से लेकर गलियों तक, मिठाइयों की अनगिनत दुकानें दिखाई देती हैं। एक बात जो हर दुकान में कॉमन है, वह है बोर्ड पर लिखा वाक्य- मशहूर गुलाब-जामुन की दुकान लगभग हर दुकान पर “शुद्ध खोए से बने गुलाब-जामुन” का दावा किया जाता है। लेकिन असली और ओरिजनल गुलाब-जामुन की पहचान अगर कहीं होती है, तो वह भीड़ से होती है। और यह भीड़ सबसे ज्यादा देखने को मिलती है धनपाल मिष्ठान भंडार पर।
आज जहां दर्जनों मिठाई की दुकानें हैं, वहां कभी एक भी दुकान नहीं हुआ करती थी। साल 1941, यानी आज़ादी से करीब 6 साल पहले, मैगलगंज चौराहे पर एक छप्पर के नीचे श्यामलाल यज्ञसैनी ने गुलाब-जामुन की एक छोटी-सी दुकान शुरू की। यही दुकान आज धनपाल मिष्ठान भंडार के नाम से जानी जाती है। उस दौर में गुलाब-जामुन जैसी मिठाई किसी कस्बे में बड़ी बात मानी जाती थी। श्यामलाल की बनाई मिठास धीरे-धीरे लोगों की ज़ुबान पर चढ़ने लगी और देखते ही देखते यह दुकान मैगलगंज की पहचान बन गई।
धनपाल मिष्ठान से जुड़ा एक किस्सा आज भी मैगलगंज में बड़े गर्व से सुनाया जाता है। उस समय श्यामलाल 1 रुपए में 16 गुलाब-जामुन बेचा करते थे, जो उस दौर में काफी बड़ी मात्रा मानी जाती थी। लेकिन जो लोग आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारी होते थे, उन्हें वे गुलाब-जामुन मुफ्त में खिलाते थे। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक, श्यामलाल का मानना था कि जो लोग देश के लिए जान की बाज़ी लगा रहे हैं, उन्हें मिठास का स्वाद भी बिना कीमत चुकाए मिलना चाहिए। यह सोच उनकी दुकान को सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि एक आजादी से जुड़ी विरासत बना देती है।
आज यह दुकान धनपाल मिष्ठान भंडार के नाम से जानी जाती है और इसे चला रहे हैं राहुल गुप्ता, जो इस दुकान की चौथी पीढ़ी हैं। राहुल गुप्ता बताते हैं कि उनके दादा धनपाल गुप्ता ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और फिर उनके पिता और अब वे स्वयं इस स्वाद को जिंदा रखे हुए हैं। राहुल कहते हैं, कि हमने कभी स्वाद से समझौता नहीं किया। आज भी गुलाब-जामुन शुद्ध खोये, देसी घी और पुराने तरीके से बनाए जाते हैं। शायद यही वजह है कि लोग दूर-दूर से यहां आते हैं।”
मैगलगंज में कई दुकानें हैं, लेकिन धनपाल मिष्ठान पर लगी भीड़ खुद बता देती है कि असली गुलाब-जामुन कहां मिलते हैं। सुबह से लेकर देर रात तक, यहां ग्राहकों की लाइन लगी रहती है। शादी-ब्याह, त्योहार, मुंडन, या फिर यूं ही गुजरते मुसाफिर-हर कोई यहां रुकता जरूर है। कई लोग तो लखीमपुर खीरी, सीतापुर, शाहजहांपुर और यहां तक कि लखनऊ से भी सिर्फ गुलाब-जामुन खाने मैगलगंज आते हैं।
आज मैगलगंज सिर्फ एक कस्बा नहीं, बल्कि एक ब्रांड बन चुका है। यहां की अर्थव्यवस्था, पहचान और पर्यटन-सब कुछ गुलाब-जामुन के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गुलाब-जामुन ने मैगलगंज को नक्शे पर एक अलग पहचान दिलाई है।
जो भी पहली बार मैगलगंज आता है, वह यहां के गुलाब-जामुन का स्वाद जिंदगी भर नहीं भूल पाता। मुलायम, रस से भरे, सही मिठास और देसी खुशबू यही है मैगलगंज के गुलाब-जामुन की असली पहचान। कस्बे से गुजरते वक्त जब वह मीठी खुशबू आपको रोक ले और आंखें खुद-ब-खुद उस बोर्ड पर टिक जाएंगी-“गुलाब जामुन खाकर जाइएगा” तो समझ लीजिए, आप मैगलगंज पहुंच चुके हैं।
Updated on:
18 Jan 2026 10:54 am
Published on:
18 Jan 2026 10:01 am
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