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Kisan Samachar: घटती यूरिया थैली, बढ़ती प्रति किलो कीमत ने खेती की लागत बढ़ाकर किसानों की कमर तोड़ दी

देशभर के किसानों के लिए यूरिया की कीमतों में बदलाव एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बैग का वजन लगातार घटा है, जबकि प्रति किलो दर बढ़ती रही। यह बदलाव भले धीरे हुआ हो, लेकिन खेती की लागत पर इसका सीधा असर पड़ा है, जिससे किसानों का आर्थिक बोझ बढ़ा।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Feb 03, 2026

कम होती थैली, बढ़ती कीमत: यूरिया के बदलते वजन और दाम ने बढ़ाया किसानों का बोझ    (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

कम होती थैली, बढ़ती कीमत: यूरिया के बदलते वजन और दाम ने बढ़ाया किसानों का बोझ    (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

Kisan Samachar Farming Crisis:   भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ खेती केवल पेशा नहीं बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन का आधार है। खेती की लागत में खाद, बीज, डीजल और मजदूरी की बड़ी भूमिका होती है। इनमें भी यूरिया सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली रासायनिक खाद है। यही कारण है कि यूरिया के दाम और उपलब्धता सीधे किसानों की आय और खेती की लागत को प्रभावित करते हैं। पिछले लगभग 8-9 वर्षों में यूरिया की थैली का वजन कम होता गया, जबकि कीमत लगभग स्थिर दिखती रही। पहली नज़र में यह बदलाव मामूली लग सकता है, लेकिन जब प्रति किलो लागत निकाली जाती है तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

पहले क्या था हाल? (2018 से पहले)

2018 से पहले तक किसानों को यूरिया की थैली 50 किलोग्राम की मिलती थी। इसकी कीमत लगभग ₹268 प्रति बैग थी। यानी ₹5.36 प्रति किलो के हिसाब से किसान को यूरिया मिल रहा था। यह दर वर्षों तक स्थिर रही और किसान इसी आधार पर अपनी लागत का अनुमान लगाते रहे।

पहला बड़ा बदलाव (2018–2025)

2018 के बाद यूरिया की थैली का वजन घटाकर 45 किलोग्राम कर दिया गया, लेकिन कीमत लगभग वही रखी गई - ₹266.50 प्रति बैग। ऊपरी तौर पर किसान को लगा कि दाम में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई, बल्कि बैग सस्ता ही हुआ।
लेकिन असल गणित कुछ और था। 

  • ₹266.50 ÷ 45 किलो = लगभग ₹5.92 प्रति किलो
  • यानी पहले की तुलना में 56 पैसे प्रति किलो की बढ़ोतरी।
  • किसानों के लिए यह एक “छुपी हुई महंगाई” थी -थैली छोटी हुई, पर खर्च बढ़ गया।

दूसरा बदलाव (2026 - नया पैटर्न)

अब 2026 में एक और बदलाव सामने आया है। यूरिया की थैली का वजन और घटाकर 40 किलोग्राम कर दिया गया है, जबकि कीमत लगभग ₹254 प्रति बैग रखी गई है।

फिर से वही गणित देखें:


  • ₹254 ÷ 40 किलो = लगभग ₹6.35 प्रति किलो
  • इस बार प्रति किलो कीमत में करीब 43 पैसे की और बढ़ोतरी हुई।




अवधिबैग का वजनबैग की कीमतप्रति किलो कीमत
2018 से पहले50 किलो₹268₹5.36
2018–202545 किलो₹266.50₹5.92
2026 (नया)40 किलो₹254₹6.35
कुल बढ़ोतरी: ₹5.36 से ₹6.35 प्रति किलो यानी लगभग 99 पैसे प्रति किलो की वृद्धि




किसान पर इसका क्या असर





अब इसे खेती की असली ज़मीन पर समझिए। एक औसत किसान एक सीजन में 20–30 बैग यूरिया इस्तेमाल करता है। बड़े किसानों के लिए यह संख्या 100 बैग से भी ज्यादा हो सकती है।


अगर किसान 50 बैग यूरिया लेता है:

  • पहले (50 किलो वाले समय):
  • 50 बैग × 50 किलो = 2500 किलो
  • लागत = ₹13,400 के आसपास
  • अब (40 किलो वाले समय):
  • 50 बैग × 40 किलो = 2000 किलो
  • समान मात्रा पाने के लिए किसान को 62–63 बैग लेने होंगे
  • कुल खर्च = लगभग ₹15,800+ यानी केवल यूरिया पर ही हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च।

“दाम नहीं बढ़े” वाली धारणा क्यों भ्रामक है

सरकारी स्तर पर अक्सर यह कहा जाता है कि यूरिया के दाम वर्षों से स्थिर हैं। लेकिन यह बात बैग के हिसाब से सही हो सकती है, प्रति किलो के हिसाब से नहीं। जब वजन कम होता है और कीमत लगभग वही रहती है, तो असल में उपभोक्ता  यहाँ किसान ज्यादा पैसा दे रहा होता है। इसे अर्थशास्त्र में Shrinkflation (संकुचन-महंगाई) कहा जाता है।

खेती की बढ़ती लागत, घटती आमदनी

किसान पहले से ही इन समस्याओं से जूझ रहा है,डीजल महंगा,मजदूरी महंगी,बीज और कीटनाशक महंगे,MSP हर फसल पर लागू नहीं,मौसम की अनिश्चितता,अब खाद की प्रति किलो लागत बढ़ना, खेती को और महंगा बना रहा है। छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा असर। भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं। उनके पास कम जमीन,सीमित पूंजी।कर्ज का दबाव,ऐसे में प्रति किलो 1 रुपये की बढ़ोतरी भी उनके लिए बड़ा फर्क पैदा करती है।