
मथुरा में वसंतोत्सव से शुरू हुआ 40 दिवसीय रंगोत्सव, राधा-कृष्ण की नगरी रंग, भक्ति और उल्लास में सराबोर (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Lathmar Holi Mathura: भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में रंग, रस और भक्ति का अनुपम संगम एक बार फिर देखने को मिलने जा रहा है। ब्रजभूमि में हर वर्ष आयोजित होने वाला 40 दिवसीय रंगोत्सव वसंत पंचमी के पावन अवसर पर वसंतोत्सव से आरंभ हो गया है, जो आगे चलकर विश्व प्रसिद्ध होली महोत्सव का रूप ले लेता है। वसंत के आगमन के साथ ही मंदिरों, गलियों और गांवों में उल्लास, संगीत और रंगों की बयार बहने लगी है।
वसंतोत्सव के दिन ब्रज के प्रमुख मंदिरों में ठाकुर जी को पीतांबर (पीले वस्त्र) धारण कराए जाते हैं। मान्यता है कि पीला रंग वसंत ऋतु, ऊर्जा और उल्लास का प्रतीक है। इस दिन मंदिरों की सजावट विशेष रूप से पीले फूलों, सरसों के ताजे गुच्छों और वसंत ऋतु के अनुरूप भोग से की जाती है। जैसे ही मंदिरों के कपाट खुलते हैं, पीली आभा में नहाए ठाकुर जी के दर्शन से श्रद्धालु भावविभोर हो उठते हैं। वसंत का यह दृश्य भक्तों को प्रकृति और भक्ति के गहरे संबंध का अनुभव कराता है।
वसंतोत्सव के दौरान ठाकुरजी को टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक गुलाल अर्पित किए जाते हैं। यह परंपरा ब्रज की उस सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है, जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य और शुद्धता को महत्व दिया जाता है। टेसू के फूलों से बना रंग न केवल पर्यावरण के अनुकूल होता है, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण के समय की परंपराओं से भी जुड़ा माना जाता है। इसी के साथ ब्रज में होली के रंगोत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।
जैसे-जैसे फाल्गुन का महीना नजदीक आता है, नंदगांव और बरसाना में होली का रंग और भी गहरा होता जाता है। राधा रानी और कन्हैया के चरणों में गुलाल अर्पित होते ही पूरा वातावरण होलीमय हो जाता है। गोस्वामी समाज द्वारा आयोजित समाज गायन के दौरान एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुरुआत की जाती है। ढोल, मंजीरे और धमार गायन की गूंज से पूरा ब्रज क्षेत्र भक्ति रस में डूब जाता है।
फाल्गुन मास के आरंभ होते ही ब्रज में धमार गायन की परंपरा शुरू हो जाती है। यह गायन राधा-कृष्ण की लीलाओं पर आधारित होता है और इसे होली के उत्सव का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। धमार की ताल पर झूमते भक्त, रंगों में सराबोर गलियां और मंदिरों में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ - यह दृश्य ब्रज की होली को दुनिया भर में अद्वितीय बनाता है।
ब्रज परंपरा के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन होली का डांडा गाढ़ा जाना इस बात का संकेत माना जाता है कि अब होली की तैयारियां पूरे जोर पर शुरू हो चुकी हैं। यह परंपरा बताती है कि अब लाठियां निकलेंगी, रंग बरसेंगे और लीलाओं का सिलसिला शुरू होगा। यह दिन नंदगांव और बरसाना में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसके बाद ही लठामार होली की तैयारियां तेज हो जाती हैं।
विश्व प्रसिद्ध नंदगांव-बरसाना की लठमार होली की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच रही हैं। हुरियारे और हुरियारिन अपने-अपने पारंपरिक वेशभूषा, गीतों और रस्मों के साथ इस अनोखे पर्व की तैयारी में जुट गए हैं। लठामार होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह राधा-कृष्ण की लीलाओं का जीवंत मंचन है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक ब्रज पहुंचते हैं।
सेवायत लोकेश गोस्वामी के अनुसार, इस वर्ष रंगोत्सव और होली महोत्सव के अंतर्गत कई प्रमुख आयोजन प्रस्तावित हैं -
प्रशासन और मंदिर समितियों द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि होली महोत्सव से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बल मिलता है। होटल, धर्मशाला, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों की मांग इस दौरान चरम पर रहती है।
ब्रज की होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि यह भक्ति, प्रेम और परंपरा का जीवंत उत्सव है। राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है।
Published on:
22 Jan 2026 09:59 am

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