
Lawrence Bishnoi Gang: मुंबई पुलिस और देश के कई राज्यों की पुलिस इन दिनों एक असामान्य और जटिल कानूनी स्थिति का सामना कर रही है। बिश्नोई गैंग से जुड़े मामलों में पुलिस उन लोगों को हिरासत में लेने या उनसे प्रभावी पूछताछ करने में असमर्थ है, जिन्हें वह इन अपराधों का कथित मास्टरमाइंड मानती है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 303 का लागू होना है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा सक्रिय किया गया है। सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्रालय के अधिकारी कानून के प्रावधानों और सुरक्षा इनपुट्स को ध्यान में रखते हुए कड़े फैसले लेते हैं।
रविवार को मशहूर फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी के घर के बाहर हुई फायरिंग की घटना ने एक बार फिर मुंबई की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना की जिम्मेदारी एक ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट ने ली है, जो खुद को बिश्नोई गैंग से जुड़ा हुआ बता रहा है। इससे पहले भी ऐसे कई मामलों में इसी तरह के सोशल मीडिया दावे सामने आ चुके हैं। हालांकि, यदि इस मामले में भी बिश्नोई गैंग की संलिप्तता सामने आती है तो मुंबई पुलिस के सामने वही पुरानी समस्या खड़ी हो जाएगी। आरोपियों तक कानूनी रूप से पहुंच न होना।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 14 अप्रैल 2024 को बांद्रा स्थित गैलेक्सी अपार्टमेंट यानी अभिनेता सलमान खान के घर के बाहर हुई फायरिंग के मामले में मुंबई पुलिस ने अपनी चार्जशीट में गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई को मुख्य साजिशकर्ता बताया था। हैरानी की बात यह रही कि चार्जशीट में उसे 'फरार आरोपी' के रूप में दर्शाया गया, जबकि उस समय वह गुजरात की साबरमती जेल में बंद था। आमतौर पर फरार आरोपी वह होता है, जो पुलिस की पकड़ से बाहर हो और खुलेआम घूम रहा हो। लेकिन इस मामले में स्थिति उलट थी। आरोपी जेल में था, फिर भी मुंबई पुलिस उससे पूछताछ या कस्टडी हासिल नहीं कर सकी।
12 अक्टूबर 2024 को NCP नेता बाबा सिद्दीकी की उनके बेटे के बांद्रा ऑफिस के बाहर हत्या कर दी गई। इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में मुंबई पुलिस ने लॉरेंस बिश्नोई के छोटे भाई अनमोल बिश्नोई को चार्जशीट में वांटेड आरोपी घोषित किया। अनमोल पिछले कई सालों से फरार था और माना जा रहा था कि वह कनाडा और अमेरिका के बीच आवाजाही कर रहा है। नवंबर 2024 में उसे भारत डिपोर्ट किया गया और तिहाड़ जेल में रखा गया। इसके बावजूद मुंबई पुलिस अब तक उसकी कस्टडी नहीं ले सकी।
मुंबई पुलिस की इस असहाय स्थिति की जड़ BNSS की धारा 303 है। इस धारा के तहत यदि किसी मामले की जांच NIA जैसी केंद्रीय एजेंसी कर रही हो तो केंद्र या राज्य सरकार यह आदेश दे सकती है कि आरोपी को जिस जेल में रखा गया है, वहां से बाहर नहीं निकाला जाएगा। धारा 303(2) के तहत इस प्रावधान को लागू करने के लिए तीन प्रमुख शर्तें हैं। इसमें अपराध की गंभीरता और प्रकृति, आरोपी को बाहर निकालने से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका और व्यापक जनहित शामिल है। इन शर्तों के आधार पर गृह मंत्रालय यह तय करता है कि आरोपी को किसी अन्य एजेंसी या राज्य पुलिस को सौंपा जाए या नहीं।
जांच एजेंसियों का कहना है कि जेल के भीतर पूछताछ बेहद सीमित होती है। आमतौर पर केवल एक या दो अधिकारियों को ही कुछ घंटों के लिए आरोपी से मिलने की अनुमति मिलती है। आमने-सामने बैठकर लंबी पूछताछ, अन्य आरोपियों से आमना-सामना (Confrontation) या तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर गहन जांच लगभग असंभव हो जाती है। मुंबई पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “जब हमने सलमान खान फायरिंग मामले में लॉरेंस बिश्नोई की भूमिका की पहचान की, वह पहले से साबरमती जेल में था। हमने पूछताछ की कोशिश की, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण उसकी कस्टडी नहीं मिल सकी। अनमोल बिश्नोई के भारत डिपोर्ट होने के एक महीने बाद ही उसके मामले में भी BNSS की धारा 303 लागू कर दी गई।”
इस कानूनी ढांचे का नतीजा यह है कि मुंबई पुलिस और अन्य राज्य पुलिस फोर्स बिश्नोई गैंग के कथित मास्टरमाइंड तक सीधे पहुंच नहीं बना पा रही हैं। सोशल मीडिया के जरिए धमकियां, जिम्मेदारी लेने के दावे और जमीनी स्तर पर अपराध सब कुछ जारी है, लेकिन पूछताछ और साजिश की परतें खोलने की प्रक्रिया बेहद धीमी और सीमित हो गई है। रोहित शेट्टी फायरिंग मामले में आगे क्या मोड़ आता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इस केस में भी केंद्रीय एजेंसियां सक्रिय होती हैं और क्या BNSS की धारा 303 एक बार फिर मुंबई पुलिस के लिए सबसे बड़ी बाधा बनती है।
Published on:
02 Feb 2026 05:57 pm
बड़ी खबरें
View Allमुंबई
महाराष्ट्र न्यूज़
ट्रेंडिंग
