
Bombay High Court Decision: बॉम्बे हाईकोर्ट औरंगाबाद बेंच ने एक जरूरी निर्णय में कहा है कि पत्नियों को पहले के आदेश के तहत एकमुश्त भरण- पोषण देने से वह भविष्य में भरण-पोषण की राशि को बढ़ाकर मांगने से वंचित नहीं हो जाती। कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि दंड प्रकिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दी गई एकमुश्त राशि की वैधता एक बार में पांच साल से ज्यादा नहीं होती है, जिसके बाद पत्नी पुन: राशि को बढ़ाने की मांग कर सकती है। जस्टिस अभय एस. वाघवासे की पीठ ने पति की दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय पारित किया। कोर्ट ने कहा कि संशोधित प्रावधानों के अनुसार, एकमुश्त भुगतान की अवधि अधिकतम पांच साल तक की ही है। इस समय सीमा के खत्म होने के बाद पत्नी भरण-पोषण राशि को बढ़ाकर मांगने का कानूनी अधिकार रखती है।
प्रतिवादी पत्नी ने पहले सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर की थी। नांदेड की फैमिली कोर्ट ने 29 सितंबर 2020 को अपने फैसले में पति को ऑर्डर दिया था कि वह पत्नी को 2,000 रुपये हर माह भरण-पोषण दे, या फिर इसके बदले में 2,50,000 रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करे। पति ने आदेश का पालन किया और पत्नी ने पूरा भुगतान एकमुश्त राशि के तौर पर स्वीकार कर लिया। इसके बाद, साल 2022 में पत्नी ने सीआरपीसी की धारा 127 के तहत एक नया आवेदन दायर कर भरण-पोषण राशि को बढ़ाकर देने की मांग की। उसका कहना था कि महंगाई और जीवन यापन की लागत में बढ़ोतरी होने के कारण पहले से तय की गई राशि काफी नहीं है। उसने 15,000 रुपये की मांग की।
फैमली कोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को आंशिक रूप से आवेदन को स्वीकार कर लिया और भरण-पोषण की राशि को बढ़ाकर 6,000 रुपये कर दिया। इस आदेश से नाखुश होकर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा जा खटखटाया। याचिकाकर्ता पति की ओर से पेश वकील आई. डी. मणियार ने तर्क दिया कि दोनों का विवाह 2001 में हुआ था, लेकिन संबंधों में खटास आने के कारण 2018 में तलाक हो गया था।
पति की मुख्य दलील यह थी कि चूंकि 2020 के आदेश में मासिक भुगतान या एकमुश्त भुगतान का विकल्प था और उसने 2.50 लाख रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान कर दिया है जिसे पत्नी ने स्वीकार भी कर लिया है, इसलिए अब वह धारा 127 के तहत नई कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती। वकील ने जोर देकर कहा कि एकमुश्त भरण-पोषण देने के बाद पत्नी दोबारा दावा करना अनुचित है। प्रतिवादी पत्नी इस पुनरीक्षण कार्यवाही में उपस्थित नहीं हुई।
जस्टिस वाघवासे ने फैमिली कोर्ट के आदेश की कानूनी वैधता की जांच की। कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के संशोधित प्रावधान (2A) का हवाला दिया, यह निर्धारित करता है कि मजिस्ट्रेट एकमुश्त भुगतान का आदेश दे सकता है। प्रावधान का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पाया कि कानून साफ-साफ कहता है कि एकमुश्त भरण-पोषण आदेश एक समय में पांच साल से ज्यादा की अवधि को कवर नहीं करता है, जब तक कि पार्टियों का आपसी सहमति से लंबी अवधि तय न की गई हो।
लॉ ट्रेंड के अनुसार, इस मामले के तथ्यों पर इसे लागू करते हुए कोर्ट ने नोट किया कि 29 सितंबर 2020 को दी गई 2,50,000 रुपये की एकमुश्त राशि का जीवनकाल केवल पांच सालों के लिए यानी सितंबर 2025 तक ही वैध था। यहां कोई आपसी समझौता नहीं हुआ है, हालांकि भरण-पोषण बढ़ाते समय विद्वान फैमिली कोर्ट ने उपरोक्त प्रावधान को ध्यान में रखा है और यह माना कि पत्नी ने 2,50,000 रुपये के एकमुश्त भरण-पोषण का विकल्प चुना था। इसलिए पांच साल की उक्त अवधि को देखते हुए वह दोबारा बढ़ोत्तरी की मांग करने का अधिकार रखती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी तब तक भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है, जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती। बशर्ते उसके पास आजीविका के साधन न हों। याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी ने पुनर्विवाह कर लिया है। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि भरण-पोषण राशि बढ़ाने के फैमिली कोर्ट के निर्णय में कोई अवैधता या अनियमितता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कानूनन एकमुश्त भुगतान की सीमा समाप्त होने के बाद पत्नी बढ़ी हुई राशि की मांग कर सकती है।
Published on:
06 Feb 2026 07:04 pm
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