29 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘अब बस, थक चुका हूं…’ मौत से 5 दिन पहले आखिर क्यों ऐसा बोले थे अजित पवार?

Ajit Pawar: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार को बारामती में विमान हादसे में निधन हो गया। इस घटना ने पूरे महाराष्ट्र को गहरे सदमे में डाल दिया है।

3 min read
Google source verification

मुंबई

image

Dinesh Dubey

Jan 29, 2026

Ajit Pawar death

अजित पवार का निधन (Photo: IANS)

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार (28 जनवरी) की सुबह विमान हादसे में निधन हो गया। उनके असामयिक निधन से न सिर्फ महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश में शोक की लहर है। राजनीति में चार दशक से अधिक समय तक सक्रिय रहे अजित दादा के आखिरी दिनों से जुड़ी कई भावनात्मक बातें अब सामने आ रही हैं, जो उनके करीबी सहयोगी किरण गुजर ने साझा की हैं।

हाल ही में हुए महानगरपालिका चुनावों के दौरान अजित पवार (66) ने पूरे महाराष्ट्र में व्यापक प्रचार किया था। लगातार सभाएं, यात्राएं और जनसंपर्क के बावजूद उन्हें चुनावी नतीजों से वह संतोष नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी। इसके बाद भी उन्होंने हार को पीछे छोड़ते हुए 5 फरवरी को होने वाले जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों की तैयारी नए जोश के साथ शुरू कर दी थी। लेकिन भीतर ही भीतर बीते कुछ समय के विवाद, आरोप और असफलताओं की टीस उन्हें लगातार परेशान कर रही थी।

अब सब बस हुआ...

बारामती में जिस जगह उनका विमान क्रैश हुआ, वहां उनके बेहद करीबी सहयोगी और विद्या प्रतिष्ठान के ट्रस्टी किरण गुजर अपनी आंखों से उस मंजर को देख रहे थे।

किरण गुजर के मुताबिक, हादसे के पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे कहा था, “अब ये सब अच्छा नहीं लग रहा, अब बस बहुत हुआ।” यह बात उन्होंने बहुत निजी लहजे में कही थी। गुजर ने बताया कि बारामती का राजनीतिक और पारिवारिक जिम्मा उन्होंने लंबे समय तक संभाला और अजित पवार के मन में चल रहे विचारों को करीब से देखा।

पांच दिन पहले हुई आखिरी मुलाकात का जिक्र करते हुए किरण गुजर भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि अजित पवार ने खुद फोन कर कहा था कि मन बहुत ऊब गया है, कहीं बाहर चलते हैं। दोनों आधा दिन साथ घूमे, साथ भोजन किया। वही उनका आखिरी साथ का वक्त और आखिरी भोजन साबित हुआ। किरण गुजर के अनुसार, उस दौरान अजित दादा ने कहा था, राजनीति की इन बातों से उन्हें मानसिक कष्ट हो रहा है। अब मैं इन सब चीजों से थक चुका हूं। ये सारी बातें मुझे परेशान कर रही हैं।

संवेदनशील थे दादा

किरण गुजर के अनुसार, अजित पवार बेहद संवेदनशील स्वभाव के थे। वह अक्सर कहते थे कि दिन-रात मेहनत करने के बावजूद उनके हिस्से में आलोचना और दाग क्यों आते हैं। मैंने किसका बुरा किया है? लोकसभा चुनाव में हार के बाद वह विधानसभा चुनाव लड़ने को भी तैयार नहीं थे, लेकिन समझाने पर माने। वह यह भी कहते थे कि बारामती में ही उन्हें सबसे ज्यादा आलोचना क्यों झेलनी पड़ती है, जबकि उन्होंने किसी का बुरा नहीं किया।

शुरुआती दौर में उनका व्यक्तित्व सख्त और गंभीर था, लेकिन उम्र और अनुभव के साथ उसमें बदलाव आया। भगवान और आस्था को लेकर उनके विचार अलग थे। उन्होंने कभी आस्था को राजनीति का हथियार नहीं बनाया। श्रद्धा थी, लेकिन अंधविश्वास नहीं। यही बात उन्हें अलग बनाती थी।

गुजर ने कहा, बचपन में पिता के निधन और परिवार के संघर्षों के कारण अजित दादा की भगवान के प्रति धारणा अलग थी। वे कहते थे, भगवान ने मेरे लिए क्या किया? लेकिन समय और अनुभव के साथ उनके स्वभाव में बदलाव हुआ।

राजनीति में आना ही नहीं चाहते थे अजित पवार

किरण गुजर ने याद किया कि अजित पवार शुरू में राजनीति में आना ही नहीं चाहते थे। 1984 में छत्रपति सहकारी साखर कारखाने की पहली चुनावी लड़ाई के लिए उन्हें मनाने का काम भी उन्होंने ही किया था। जीत के साथ अजित पवार का राजनीतिक सफर शुरू हुआ, लेकिन तब भी वह कहते थे कि उन्हें सिर्फ अपना घर और परिवार संभालना है। बाद में वही अजित पवार बारामती और महाराष्ट्र की राजनीति का अहम चेहरा बने।

‘मेरी आंखों के सामने विमान हादसा हुआ’

सबसे दर्दनाक पल को याद करते हुए किरण गुजर ने बताया कि हादसे से ठीक पहले अजित पवार ने उन्हें फोन कर कहा था कि वह विमान में बैठ रहे हैं। उन्हें लेने के लिए वह खुद एयरपोर्ट पर मौजूद थे। उनके सामने ही विमान हादसे का शिकार हुआ। जब शव को वाहन में रखा जा रहा था, तब उन्होंने पहचान लिया कि वह अजित पवार ही हैं। उन्हें लगा जैसे कोई बुरा सपना देख रहे हों, लेकिन वह हकीकत थी।

उन्होंने कहा, "दादा ने विमान में बैठने से पहले मुझे फोन किया था। मैं उन्हें रिसीव करने एयरपोर्ट पहुंचा था, लेकिन मेरी आँखों के सामने ही विमान क्रैश हो गया। जब उनके पार्थिव देह को गाड़ी में रख जा रहा था, तब भी मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह दादा हैं। मैंने ही उन्हें पहचाना। मुझे लगा यह कोई बुरा सपना है।"