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नागौर. प्रदेश में शिक्षा सुधार और नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के बड़े-बड़े दावों के बीच सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालयों की पुस्तकालय व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है। शिक्षा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में कुल 19,815 सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं, लेकिन इनके मुकाबले पुस्तकालय अध्यक्ष के स्वीकृत पद मात्र 4,280 हैं, इनमें भी 40 फीसदी रिक्त पड़े हैं। इसका सीधा अर्थ है कि अधिकांश विद्यालय बिना पुस्तकालय अध्यक्ष के ही चल रहे हैं।
स्टाफिंग पैटर्न का बहाना
विधायक शंकरलाल की ओर से विधानसभा में लगाए गए सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि माध्यमिक शिक्षा विभाग के निर्धारित मानदण्डानुसार माध्यमिक शिक्षा विभाग अन्तर्गत संचालित विद्यालयों में पदों का आवंटन किया जाता है। मानदंडों के अनुसार 200 तक नामांकन वाले उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पुस्तकालयाध्यक्ष का पद नहीं दिया जाएगा। 200 से अधिक नामांकन होने पर पुस्तकालयाध्यक्ष—तृतीय/द्वितीय/प्रथम ग्रेड का एक पद स्वीकृत किया जाता है। स्टाफिंग पैटर्न के मानदंडों की समीक्षा की जा रही है।
जहां 200 से ज्यादा नामांकन, वहां भी पद नहीं
शिक्षा विभाग स्टाफिंग पैटर्न के मापदंडों का हवाला देकर नए पद स्वीकृत नहीं कर रहा है। जबकि नागौर सहित प्रदेश में ऐसे सैकड़ों विद्यालय हैं, जहां 200 से ज्यादा नामांकन हैं, लेकिन पुस्तकालय अध्यक्ष के पद स्वीकृत नहीं किए जा रहे हैं। इस नीति का सबसे ज्यादा असर विद्यार्थियों पर पड़ रहा है। पुस्तकालय अध्यक्ष के अभाव में न तो पुस्तकालयों का नियमित संचालन हो पा रहा है और न ही विद्यार्थियों में अध्ययन व शोध की प्रवृत्ति विकसित हो रही है। कई विद्यालयों में संस्था प्रधान या अन्य शिक्षक अतिरिक्त जिम्मेदारी निभा रहे हैं, जिससे उनका शैक्षणिक कार्य भी प्रभावित हो रहा है। पुस्तकें अलमारियों में बंद पड़ी हैं और विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं, सामान्य ज्ञान, साहित्य व संदर्भ सामग्री का समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा।
प्रदेश में रिक्त पदों की बड़ी तस्वीर
प्रदेश में पुस्तकालय अध्यक्षों की स्थिति और भी चिंताजनक है -
श्रेणी प्रथम : 42 स्वीकृत पद, जिनमें 21 रिक्त
श्रेणी द्वितीय : 1,224 स्वीकृत पद, 514 रिक्त
श्रेणी तृतीय : 3,014 स्वीकृत पद, 1,214 रिक्त
इस प्रकार कुल स्वीकृत 4280 में से 1,749 पद रिक्त पड़े हैं। इसके बावजूद वर्षों से इन पदों को भरने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर
शिक्षाविदों का मानना है कि पुस्तकालय किसी भी विद्यालय का बौद्धिक केंद्र होता है। पुस्तकालय अध्यक्ष न केवल पुस्तकों का प्रबंधन करता है, बल्कि विद्यार्थियों को सही अध्ययन सामग्री चुनने, संदर्भ पुस्तकों के उपयोग और स्वाध्याय की दिशा भी देता है। उनके बिना पुस्तकालय महज एक कमरे तक सिमट कर रह जाता है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि जब तक पद स्वीकृत नहीं होंगे और रिक्त पदों को नहीं भरा जाएगा, तब तक नई शिक्षा नीति के तहत गुणवत्ता आधारित शिक्षा का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।
नजरअंदाज करना उचित नहीं
यदि सरकार वास्तव में विद्यार्थियों में पढऩे की आदत, ज्ञानवर्धन और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करना चाहती है, तो पुस्तकालय अध्यक्षों की कमी को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता का यह बुनियादी स्तंभ जब तक मजबूत नहीं होगा, तब तक सुधार के दावे कागजों तक ही सीमित रहेंगे।
- बसन्त कुमार ज्याणी, पूर्व प्रवक्ता, राजस्थान वरिष्ठ शिक्षक संघ रेस्टा
Updated on:
20 Jan 2026 11:07 am
Published on:
20 Jan 2026 11:02 am
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