
हिमंत बिस्वा शर्मा और गौरव गोगोई (फोटो-IANS)
असम में बीजेपी 10 साल से काबिज है। यहां अप्रैल में चुनाव होना है। सीएम हिमंत भगवा किला बचाने के लिए 'साम-दाम-दंड-भेद' की रणनीति अपनाए हुए हैं, जबकि कांग्रेस ने वायनाड से सांसद प्रियंका गांधी को बड़ा जिम्मा सौंपते हुए असम विधानसभा चुनाव की स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया है। वह कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष व जोरहाट से सांसद गौरव गोगोई के साथ मिलकर हिमंता के खिलाफ रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं। कांग्रेस यहां आंतरिक लड़ाई से जूझ रही है।
असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा को नॉर्थ ईस्ट में भाजपा का चाणक्य कहा जाता है। उन्हें राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद की रणनीति से न तो परहेज है, न ही अपने कार्यकर्ताओं को करने से रोकते हैं। बीते दिनों उनको मियां मुस्लिम को लेकर एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर मियां रिक्शावाला 5 रुपए मांगे तो उसे 4 रुपए दो। उसे इतना परेशान करो कि वह राज्य छोड़ने पर मजबूर हो जाए।
उनके इस बयान की काफी आलोचना भी हुई, लेकिन वह जब से भाजपा में आए हैं, सांप्रदायिक बयानों से उन्होंने परहेज नहीं किया। दरअसल, असम में बंगाली मुसलमानों को अपमानजनक तरीके से मियां मुस्लमान कहा जाता है। राज्य की 34 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। ऐसे में वह हिंदू बहुसंख्यक आबादी को एकजुट रखने के लिए ऐसे बयान देते रहते हैं।
सीएम हिमंत का दूसरा बड़ा हथियार जनकल्याणकारी योजना है। सीएम हिमंत ने महिला वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए ओरुनोदोई योजना की शुरुआत की। उन्होंने गरीब परिवारों की महिलाओं को हर महीने 830 रुपए देने से इसकी शुरुआत की, फिर इसे बढ़ाकर ₹1,250 कर दिया गया।
इसके साथ ही, मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता अभियान, मुख्यमंत्री एति कोली दुति पात योजना, निजुत मोइना योजना और बाबू आसोनी योजना के जरिए उन्होंने लोगों के अकांउट में सीधे पैसे डाले। इससे लोगों में उनके प्रति रूझान बढ़ा। इसके साथ ही, केंद्र में बीजेपी की सरकार होने का फायदा भी राज्य को मिला। सीएम हिमंत कई प्रोजेक्ट्स गुवाहाटी और राज्य के अन्य हिस्सों में लाने में सफल रहे।
हिमंत की योजनाओं को देखकर भाजपा ने केंद्र व राज्य स्तर पर कई योजनाएं बनाई। बीजेपी ने बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में असम की असम की योजनाओं के अनुरुप ही योजनाएं बनाईं। चुनाव से ठीक पहले उन्हें लागू किया और राज्य के लोगों के खाते में पैसे पहुंचाए। इसका सुखद नतीजा पार्टी को विभिन्न देखने को भी मिला।
हिमंत की राजनीति को लेकर सियासी जानकार कहते हैं कि असम की राजनीति में फिलहाल वह सबसे बड़े चेहरे हैं। वह लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लोग उन्हें मामा, भाई और चाचा कहकर बुलाते हैं। हिमंत की सांप्रदायिक राजनीति करने पर कहा कि वह मूलत: कांग्रेस में थे। बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने हार्डलाइन की राजनीति शुरू की है। बीजेपी को फिलहाल असम में बढ़त हासिल है। सीएम हिमंत किसी भी हालत में अपना किला बचाना चाहते हैं। इसलिए वह विकास, कानून व्यवस्था के साथ-साथ सांप्रदायिक राजनीति भी कर रहे हैं।
कांग्रेस राज्य में आंतरिक कलह से जूझ रही है। पार्टी ने गौरव गोगोई की प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी की है। उन्हें गांधी परिवार का समर्थन भी हासिल है। असम कांग्रेस का एक धड़ा गौरव गोगोई के कामकाज के तरीकों से नाखुश है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि वह सबको साथ लेकर नहीं चलते हैं। उनके प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी के समय खुशी का एक झूठा माहौल बनाया गया। कांग्रेस आंतरिक चुनौतियों के बावजूद असम में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में जुटी हुई है।
कांग्रेस पार्टी अपने दो मुख्य सहयोगियों अखिल गोगोई की नेतृत्व वाली रायजोर दल और लुरिनज्योति गोगोई की अगुवाई वाली असम जातीय परिषद के साथ रणनीति तैयार कर रही है। अखिल और लुरिनज्योति ने बीते कुछ सालों में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की है। दोनों ही नेता एंटी CAA प्रोटेस्ट के दौरान सुर्खियों में आए थे। उनकी अपील ने असम के लोगों में अच्छा खासा असर किया था। अब वह कांग्रेस के साथ मिलकर आगामी चुनाव का रुख बदलने में जुट गए हैं।
कांग्रेस नेताओं का मानना है कि न तो रायजोर दल और न ही AJP बड़ी संख्या में सीटें जीत सकते हैं, लेकिन दोनों ही दल बड़ी तादाद में वोट ट्रांसफर जरूर करा सकते हैं। खासकर उन सीटों पर जहां कांग्रेस और बीजेपी की मजबूत सीधी टक्कर होने की संभावना अधिक है। स्थानीय मीडिया में छपी खबरों के अनुसार, प्रदेश कांग्रेस नेताओं का यहां तक मानना है कि अगर कांग्रेस इन पार्टियों के साथ अच्छा तालमेल बिठा पाती है, तो वह बीजेपी से मुकाबला करने के लिए एक मजबूत ताकत बन सकते हैं।
इसके साथ ही, नए सहयोगियों के आने से राज्य में मुस्लिम अल्पसंख्यकों का बड़े पैमाने पर रुझान भी कांग्रेस की तरफ मुड़ सकता है। दिलचस्प बात है कि राज्य में मुसलमानों की आबादी 34 फीसदी है। बीते चुनाव में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस से खिसकर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF की ओर चले गए थे। इससे मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव हुआ था और इसका सीधा-सीधा फायदा भाजपा को मिला।
Published on:
02 Feb 2026 02:17 pm
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