5 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Shab-e-Barat 2026 Special: क्यों मनाते हैं शबे-बरात, जानिए क्यों खास है 15वीं शाबान

Shab-e-Barat importance: शबे बरात की रात क्यों मनाई जाती है और कुरान-हदीस में इसका क्या महत्व है? जानिए भारत में शिया और सुन्नी समुदाय इसे कैसे अलग-अलग तरीके से मनाते हैं।

3 min read
Google source verification

भारत

image

MI Zahir

Feb 03, 2026

Shab-e-Barat Special

शबे-बरात पर रंगबिरंगी रोशनी से सजी मस्जिदें और तरह तरह के हलवे। ( फोटो: AI)

Shab-e-Barat: इस्लामी कैलेंडर के सबसे पवित्र महीनों में से एक 'शाबान' का आधा हिस्सा बीतने वाला है। मुस्लिम समुदाय में शाबान की 15वीं तारीख यानि 'शबे-बरात' मंगलवार को पूरे देश में श्रद्धा से मनाई जा रही है। लोग रात को जाग कर इबादत कर रहे हैं। मस्जिदों को रंगबिरंगी रोशनी से सजाया गया है। इस मौके पर घरों में हलवे बना कर फातिहा लगाई गई। इस रात का बहुत शिद्दत से इंतजार किया जाता है। इसे 'मगफिरत की रात' (मुक्ति की रात) भी कहा जाता है। यह वह रात है, जब मस्जिदें रोशनी से नहला दी जाती हैं और कब्रिस्तान दीयों की जगमगाहट से रोशन हो उठते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर इस रात को इतना महत्व क्यों दिया जाता है और कुरान-हदीस में इसका क्या स्थान है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।

क्या है शबे-बरात का असली मतलब ?

फारसी भाषा में 'शब' का अर्थ है रात और 'बरात' का मतलब है बरी होना या मुक्ति पाना। आसान शब्दों में, यह वह रात है जब बंदे अपने गुनाहों से तौबा करके जहन्नुम (नरक) की आग से मुक्ति मांगते हैं। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात अल्लाह की रहमत अपने पूरे जोरों पर होती है।

कुरान और हदीस की रोशनी में

धार्मिक विद्वानों के मुताबिक, कुरान में 'शबे बरात' शब्द का सीधा जिक्र नहीं मिलता, लेकिन सूरह 'अद-दुखान' की आयतों में एक "बरकत वाली रात" का जिक्र है। कई मुफस्सिरीन (हदीस के व्याख्याकार) इसे शबे कद्र से जोड़ते हैं, तो कुछ इसे 15वीं शाबान मानते हैं। वहीं, हदीस (पैगंबर के कथन) में इसका महत्व साफ है। एक मशहूर रिवायत के अनुसार, "इस रात अल्लाह ताला अपनी मखलूक (सृष्टि) की तरफ खास तवज्जो फरमाता है और सभी को माफ कर देता है, सिवाय दो लोगों के- एक वो जो मुशरिक (शिर्क करने वाला) हो और दूसरा वो जिसके दिल में किसी के लिए कीना (ईर्ष्या/दुश्मनी) हो।"

तकदीर के फैसलों की रात

आम मुस्लिम धारणा यह है कि शबे बरात ' अपने कर्मों के बजट की रात' जैसी होती है। माना जाता है कि इस रात आने वाले पूरे साल के फैसलों की फाइल तैयार होती है। इसमें यह तय किया जाता है कि अगले साल कौन पैदा होगा, किसकी मौत होगी, किसे कितना रिज़्क (रोजी) मिलेगा और कौन हज पर जाएगा। इसलिए लोग पूरी रात जाग कर अपने बेहतर भविष्य और लंबी उम्र की दुआ मांगते हैं।

भारत में दो अलग-अलग नजारे (शिया और सुन्नी मत)

भारत की गंगा-जमुनी तहजीब में शबे-बरात मनाने के दो रंग देखने को मिलते हैं:

सुन्नी समुदाय: सुन्नी मुसलमानों के लिए यह इबादत और पूर्वजों को याद करने का समय है। वे कब्रिस्तानों में जाकर अपने मरहूमों (पूर्वजों) के लिए दुआ-ए-मगफिरत (मोक्ष के लिए प्रार्थना) करते हैं। घरों में सूजी और चने आदि हलवा बनता है, जो गरीबों में बांटा जाता है।

शिया समुदाय: शिया मुसलमानों के लिए यह दोहरी खुशी का मौका होता है। इस दिन (15 शाबान) उनके 12वें इमाम, हज़रत इमाम मेहदी का जन्मदिन भी होता है। इसलिए शिया बहुल इलाकों में इसे जश्न के तौर पर मनाया जाता है। घरों को सजाया जाता है और केक काटे जाते हैं।

राज्यों के अनुसार बदलती परंपराएं

शबे बरात पर भारत के कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, इबादत का तरीका एक जैसा है, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली,पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बंगाल व आसाम सहित पूरे देश में शबे बरात मनाई जाती है, लेकिन परंपराएं जुदा जुदा हैं। कश्मीर और उत्तर भारत (यूपी, बिहार) में हलवा-पूरी और फिरनी बनाने का बहुत रिवाज है। वहीं, हैदराबाद और तेलंगाना में भी इसे 'जागने की रात' कहा जाता है, जहां रात भर होटलों में हलीम और चाय का दौर चलता है। केरल और दक्षिण भारत में आतिशबाजी नहीं होती, वहां पूरा जोर सादगी से नमाज पढ़ने और दान (खैरात) करने पर रहता है।

क्या कहते हैं लोग

मौलाना खालिद रशीद (धर्मगुरु):

"यह रात आतिशबाजी या हुड़दंग की नहीं है। यह अपने गिरेबान में झांकने और रो-रोकर अल्लाह से माफी मांगने की रात है। युवाओं को चाहिए कि वे सड़कों पर घूमने के बजाय मस्जिदों में इबादत करें।"

जुनैद खान (स्थानीय निवासी):

"हम पूरे साल इस रात का इंतजार करते हैं। घर की महिलाएं दिन भर हलवा और पकवान बनाती हैं, जिसे हम शाम को गरीबों और रिश्तेदारों में बांटते हैं। इससे आपसी भाईचारा बढ़ता है।"

इबादत की रात के बाद अगला कदम क्या?

शबे बरात की रात गुजरने के बाद, अगली सुबह (यानी 15 तारीख का दिन) रोजा रखने की बड़ी फजीलत बताई गई है। यह रोजा नफिल (ऐच्छिक) होता है, लेकिन इसका सवाब (पुण्य) बहुत ज्यादा माना जाता है। इसके साथ ही, शबे बरात इस बात का संकेत है कि पवित्र महीना 'रमजान' अब बस 15 दिन दूर है। मुस्लिम समुदाय इस रात से ही रमजान की मानसिक और शारीरिक तैयारी शुरू कर देता है। मस्जिदों में साफ-सफाई और रंग-रोगन का काम तेज हो जाता है।