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मौत के आखिरी तीन दिन: पिता जा चुके थे, जवाहर लाल को लगा सो रहे हैं, मां रोईं तो रोका- नींद टूट जाएगी

दो किताबों के हवाले से जानिए कैसा था मोती लाल नेहरू का स्वभाव और जवाहर लाल का उनसे लगाव।

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भारत

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Vijay Kumar Jha

Feb 06, 2026

Motilal Nehru death anniversary story showing Jawaharlal Nehru remembering his father, मोतीलाल नेहरू के अंतिम दिनों और जवाहरलाल नेहरू की यादों से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी

जब कलम लेने पर जवाहर लाल को पिता ने मारा था ऐसा धक्का कि कई दिन रहा था जख्म। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)

6 फरवरी, 1931 की सुबह जवाहरलाल नेहरू को अनाथ कर देने वाली सुबह थी। मोतीलाल नेहरू अपने जमाने के सबसे महंगे बैरिस्टर्स में से एक थे। राजे-रजवाड़े उनके मुवक्किल हुआ करते थे। जम कर कमाना और सुख-सुविधा भोगना उनके जीवन का फलसफा था। कांग्रेस से जुड़ने और आजादी की लड़ाई में शामिल होने के बाद उनका नजरिया थोड़ा बदला था। हालांकि, अंतिम वक्त में वह बीमार हो गए थे। ऐसी स्थिति हो गई थी कि उनके घर के पास ‘स्वराज भवन’ में कांग्रेस की बैठक हो रही थी, लेकिन वह उसमें शरीक नहीं हो पा रहे थे।

मोतीलाल नेहरू के बेटे जवाहर ने 'जवाहरलाल नेहरू: एन ऑटोबायोग्राफी' में पिता के अंतिम दिनों का ब्योरा लिखा है। अंत समय में यह हाल हो गया था कि पार्टी के कामकाज में भी शामिल नहीं हो पा रहे थे। मौत से महज कुछ दिन पहले इलाहाबाद में आनंद भवन से सटे स्वराज भवन में पार्टी की बैठक चल रही थी, लेकिन मोतीलाल नेहरू न उसमें शामिल हो पाए थे और न ही दिलचस्पी लेने की स्थिति में थे। यह फरवरी के पहले हफ्ते की बात थी। असल में यह बैठक बुलाई ही इसलिए गई थी कि सारे नेता संभवतः अंतिम बार मोतीलाल नेहरू से मिल लेंगे। बैठक एक बहाना था।

4 फरवरी, 1931: पिता को एक्सरे के लिए लखनऊ ले गए जवाहर लाल

बैठक खत्म हुई तो बाहर से आए सारे नेता अपनी-अपनी जगह रवाना हो गए। गांधीजी इलाहाबाद में ही रुक गए थे। 4 फरवरी की सुबह मोतीलाल थोड़ा बेहतर महसूस कर रहे थे। यह देख कर तय किया गया कि उन्हें लखनऊ ले जाया जाए। एक्सरे करवाने के लिए। इलाहाबाद में इसकी सुविधा नहीं थी। उन्हें कार से लखनऊ ले जाया गया। गांधीजी और बड़ी संख्या में समर्थक भी गए। उन्हें धीमी रफ्तार में, आराम के साथ ले जाया गया। इसके बावजूद वह थके-थके लग रहे थे।

5 फरवरी की रात रही आखिरी

अगले दिन ऐसा लग रहा था कि उनकी थकान उतर रही है, पर कुछ दूसरी परेशानी बढ़ गई थी। रात में भी बेचैनी बनी रही।

6 फरवरी की सुबह दुनिया को अलविदा कह गए मोती लाल नेहरू

6 फरवरी की सुबह वह बिस्तर पर थे। जवाहरलाल उन्हें निहार रहे थे। उन्हें उनका चेहरा शांत लगा। चेहरे पर संघर्ष का जज्बा दिखाई नहीं दे रहा था। जवाहरलाल यह सोच कर खुश थे कि पिताजी नींद में हैं, पर उनकी मां ने असलियत भांप ली। वह ज़ोर से रो पड़ीं।

'ऑटोबायोग्राफी' में जवाहलाल लिखते हैं, 'मैं उनकी (मां) ओर मुड़ा और गुजारिश की कि पिताजी सोए हैं, उन्हें तकलीफ होगी। लेकिन वह उनकी चिर निद्रा थी, जिसमें जाने के बाद कोई जागता नहीं है।'

6 फरवरी को ही मोतीलाल का शरीर इलाहाबाद लाया गया। रंजीत (जवाहरलाल के बहनोई, विजय लक्ष्मी पंडित के पति) गाड़ी चला रहे थे। जवाहर लाल और हरि (मोतीलाल के सबसे करीबी सेवक) शव के साथ गाड़ी में बैठे थे। पीछे दूसरी कार में गांधी जी और मोतीलाल नेहरू की पत्नी बैठी थीं। उनके पीछे कारों का काफिला था। शाम में इलाहाबाद में गंगा किनारे उनका अंतिम संस्कार हुआ।

नेहरू ने लिखा है कि पिता की मौत के बाद और उनकी अंतिम यात्रा में अनगिनत लोग आए। हजारों लोगों ने संवेदनाएं और शोक संदेश भेजे। लॉर्ड और लेडी इरविन के संदेश भी आए। लेकिन, इन सबसे बढ़ कर उन दिनों में गांधी जी की मौजूदगी ने उनको और उनकी मां को सबसे ज्यादा हिम्मत दी।

पिता की मौत के तीन महीने बाद जवाहर लाल नेहरू को आया टेलीग्राम करने का ख्याल

जवाहर लाल नेहरू के लिए पिता की मौत ऐसी घटना थी, जिस पर यकीन ही नहीं हो रहा था। उनकी मौत के तीन महीने बाद वह पत्नी कमला नेहरू और बेटी इंदिरा के साथ सिलोन गए थे। वहां 'नुवारा एलिया' में वे सुकून के पल बिता रहे थे। उन्हें जगह बड़ी पसंद आई। तभी अचानक ख्याल आया कि यह जगह तो पिताजी के लिए बड़ी अच्छी रहेगी। यहां उन्हें बड़ा सुकून मिलेगा। वह थके होंगे, उन्हें आराम की जरूरत होगी। उन्हें पिता को इलाहाबाद टेलीग्राम भेजने तक का ख्याल आ गया।

जवाहर लाल को पिता की मौत के बाद मिली उनकी भेजी चिट्ठी

सिलोन से इलाहाबाद लौटने पर नेहरू के साथ एक अजीबोगरीब वाकया हुआ। उनके लिए डाकिया एक डाक लेकर आया। लिफाफे पर उनके पिता की लिखावट में उनका नाम लिखा हुआ था और अनेक पोस्ट ऑफिस के मुहर लगे थे। आश्चर्य से भरे जवाहर लाल ने लिफाफा खोला तो पाया कि यह उनके पिता ने ही भेजा था। यह 28 फरवरी, 1926 को भेजा गया था और करीब 5 साल बाद उन्हें मिला था।

1926 में जवाहर लाल नेहरू पत्नी के साथ यूरोप जा रहे थे। उसी वक्त अहमदाबाद से मोतीलाल नेहरू ने बेटे को वह खत भेजा था। उन्होंने लिफाफा बंबई (केयर ऑफ इटालियन लॉयड स्टीमर) के पते पर भेजा था। जवाहरलाल इसी स्टीमर से जाने वाले थे तो पिता ने सोचा होगा कि स्टीमर पर बेटे को लिफाफा मिल जाएगा। लेकिन, वह कहीं गुम हो गया और फिर न जाने कहां-कहां भटकते हुए 1931 की गर्मियों में अंततः पंडित नेहरू तक पहुंचा।

...जब मामूली बात पर हिंसक हो गए थे मोती लाल नेहरू

बीआर नंदा ने अपनी किताब 'द नेहरूज: मोती लाल एंड जवाहर लाल’ में भी पिता-पुत्र के संबंधों से जुड़ी कई घटनाएं दर्ज की हैं। मोतीलाल नेहरू नरम के साथ-साथ सख्त स्वभाव के और अनुशासनप्रिय थे। एक पिता के तौर पर भी उनका यही स्वभाव था।

जवाहर लाल जब महज छह साल के थे तो उन्हें पिता के गुस्से का सामना करना पड़ा था। उनके पिता की मेज पर दो फाउंटेन पेन थीं। जवाहर ने एक ले ली। पिता जब खोजने लगे तो उनकी हिम्मत नहीं हुई बताने की। लेकिन अंत में पता चल ही गया। पता चला तो उन्हें ऐसा धक्का मारा गया कि कई दिनों तक जख्म पर मरहम लगाना पड़ गया था।

नंदा ने हरि के हवाले से मोती लाल के गुस्से का एक और वाकया बताया है। एक बार उनके घर पर डिनर पार्टी थी। मेहमान खाने के लिए बैठने ही वाले थे। इसी बीच मोती लाल नेहरू ने देख लिया कि एक नौकर कमीज की आस्तीन से प्लेट साफ कर रहा था। यह देखते ही वह आग बबूला हो गए। नौकर को उन्होंने इतनी बुरी तरह पीटा कि बाकी नौकर डर के मारे वहां से गायब ही हो गए। बेचारे मेहमान भी भूखे पेट ही चुपचाप रवाना हो गए। अंत में एक पुराने स्टाफ मुंशी मुबारक अली ने किसी तरह उन्हें शांत किया।