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कुलिश जन्मशती संगोष्ठी पर वक्ताएं बोलीं: आपातकाल में भी सत्ता की आंखों में आंखें डाल सच बोले कुलिश जी

भीलवाड़ा। पत्रकारिता के पुरोधा और राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्मशती पर काशीपुरी में प्रेरणादायी संगोष्ठी आयोजित हुई। कल्याणी फाउण्डेशन के सहयोग से आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्ष दिव्या बोरदिया के साथ ही सदस्य प्रिया जैन, पूजा मल्होत्रा, रेखा शर्मा, पूनम कोठारी व प्रिया लोढ़ा ने कुलिश के व्यक्तित्व और जीवन स्मृतियों से […]

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Seminar on the birth centenary of Kapoorchand Kulish, founder of Rajasthan Patrika

Seminar on the birth centenary of Kapoorchand Kulish, founder of Rajasthan Patrika

भीलवाड़ा। पत्रकारिता के पुरोधा और राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्मशती पर काशीपुरी में प्रेरणादायी संगोष्ठी आयोजित हुई। कल्याणी फाउण्डेशन के सहयोग से आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्ष दिव्या बोरदिया के साथ ही सदस्य प्रिया जैन, पूजा मल्होत्रा, रेखा शर्मा, पूनम कोठारी व प्रिया लोढ़ा ने कुलिश के व्यक्तित्व और जीवन स्मृतियों से जुड़े प्रसंग सुनाए। उन्होंने आपातकाल की निडरता से लेकर प्रशासनिक शुचिता तक, कुलिश जी के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को आज की पीढ़ी और महिला सशक्तीकरण के लिए पथ-प्रदर्शक बताया गया। 

साहित्य और पत्रकारिता का किया एक साथ निर्वाह

" कुलिश जी का जन्म 20 मार्च 1926 को राजस्थान के टोंक जिले के सोडा गांव में हुआ था। बचपन से ही प्रतिभा के धनी कुलिश जी के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आए। अपनी प्रारंभिक शिक्षा में आए गतिरोध को तोडऩे कुलिश जी जयपुर आ गए। शुरुआती दौर में उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता का एक साथ निर्वाह किया। धीरे-धीरे वे साहित्य से पत्रकारिता की ओर मुड़ गए। और फिर उनके नेतृत्व में शुरू हुआ पत्रकारिता का ऐसा युग जिसने राजस्थान पत्रिका का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया "। 

दिव्या बोरदिया, अध्यक्ष कल्याणी फाउण्डेशन https://www.dailymotion.com/video/x9z2d2k

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राजस्थान पत्रिका' जैसा अक्षय वटवृक्ष खड़ा किया

" श्रद्धेय कपूर चन्द्र कुलिश जी का व्यक्तित्व स्वाभिमान, साहस और सादगी का त्रिवेणी संगम था। उन्होंने अपनी सिद्धांतों की शक्ति से सींचकर 'राजस्थान पत्रिका' जैसा अक्षय वटवृक्ष खड़ा कर दिया। उनके सादगीपूर्ण व्यक्तित्व के कारण वे शिखर पर होकर भी जन-जन के हृदय में बस गए।

आज हम उस महान व्यक्तित्व कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की 100वीं जयंती मना रहे हैं, जिनका जीवन साहस की एक खुली किताब है। कुलिश जी ने उस दौर में पत्रकारिता शुरू की जब बड़े-बड़े अखबारों पर पैसे वालों का कब्जा था। लेकिन कुलिश जी का मानना था कि कलम किसी की गुलाम नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने मात्र 500 रुपये उधार लेकर एक छोटे से कमरे से 'राजस्थान पत्रिका' की शुरुआत की। वे चाहते तो किसी बड़े अखबार में आराम की नौकरी कर सकते थे, लेकिन उन्हें अपनी स्वतंत्रता प्यारी थी।

जब उनके संपादक ने उनके लिखने पर अंकुश लगाना चाहा, तो उन्होंने तुरंत इस्तीफा दे दिया। उनका यह कदम हमें सिखाता है कि आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ भी नहीं होता। आज की महिलाओं के लिए उनकी यह कहानी एक बड़ी प्रेरणा है कि साधनों से ज्यादा संकल्प मायने रखता है। शून्य से शिखर तक का उनका यह सफर हम सबके लिए स्वावलंबन का पाठ है। कुलिश जी ने साबित किया कि अगर इरादे नेक हों, तो उधार की पूंजी से भी वटवृक्ष खड़ा किया जा सकता है। उनकी सादगी और संघर्ष ही आज पत्रिका समूह की सफलता की असली बुनियाद है" ।

प्रिया जैन

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आपातकाल और निडर लेखनी

" आज मैं, कुलिश जी के उस निडर रूप की बात करूंगी जिसने सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच कहा। 1975 का वो दौर जब देश में इमरजेंसी लगी थी, अखबारों पर पहरे बिठा दिए गए थे। उस कठिन समय में कुलिश जी एक ढाल बनकर खड़े हुए और पत्रकारिता के धर्म को निभाया। सरकार ने उन्हें डराने के लिए पत्रिका ऑफिस की बिजली तक काट दी थी। सेंसरशिप के कारण खबरें रोकना चाहा, तो उन्होंने बिना संपादकीय के ही अखबार छाप दिया। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री तक को पत्र लिखकर अपनी बात बेबाकी से रखी। कुलिश जी कहते थे कि अगर अखबार सच नहीं दिखा सकता, तो उसका कोई मोल नहीं है। उनकी यह निडरता हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। एक महिला होने के नाते, मुझे उनकी यह हिम्मत बहुत प्रभावित करती है। उन्होंने कभी भी परिणामों की चिंता नहीं की, बस अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहे। आज उनकी जन्मशती पर हमें उनके इस निडर स्वभाव को अपने जीवन में उतारना चाहिए "।

पूजा मल्होत्रा

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जन-सरोकार और सामाजिक जिम्मेदारी

" कुलिश जी की नजर में अखबार केवल खबरों का कागज नहीं, बल्कि समाज के दुख-दर्द की दवा था। उन्होंने जयपुर के शुरुआती दिनों में हुए हर बड़े जन-आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। चाहे स्कूल की फीस बढ़ने का मामला हो या शहर की कोई और समस्या, उन्होंने हमेशा जनता का साथ दिया। उनका मानना था कि पत्रकार का धर्म केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाना है। वे सत्ता के अच्छे कामों की तारीफ करते थे, लेकिन गलत नीतियों पर प्रहार करने से भी नहीं चूकते थे। कुलिश जी ने पत्रिका को एक परिवार की तरह बनाया जहां हर पाठक खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है। उन्होंने हमेशा यह सिखाया कि हमें अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को कभी नहीं भूलना चाहिए। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में उनकी यह सोच बहुत जरूरी है कि हम दूसरों के काम आ सकें। वे समाज की कुरीतियों के खिलाफ हमेशा एक सजग प्रहरी की तरह खड़े रहे। उनकी दृष्टि में एक अखबार वही है जो दबे-कुचले लोगों की आवाज बन सके। उनकी 100वीं जयंती पर हम उनके दिखाए इसी सेवा भाव को नमन करते हैं। समाज के प्रति उनकी यह संवेदनशीलता हम सबके लिए भी एक बड़ा सबक है "।

रेखा शर्मा

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प्रशासनिक शुचिता और नैतिक मूल्य

" कुलिश जी ने हमेशा राजनीति और प्रशासन में ईमानदारी की वकालत की। उनका मानना था कि अगर लोकतंत्र की बुनियाद ही झूठ पर होगी, तो देश का भला कैसे होगा? उन्होंने नौकरशाही यानी अफसरों की कार्यशैली पर भी हमेशा कड़े सवाल उठाए। वे दुख जताते थे कि आम आदमी फाइलों के पीछे दफ्तरों के चक्कर लगाता रहता है। कुलिश जी चाहते थे कि प्रशासन पारदर्शी हो और हर काम समय पर हो। उनके लेखों में अक्सर समाज में फैली दिखावे की प्रवृत्ति और भ्रष्टाचार पर चोट होती थी। वे कहते थे कि झूठ पर आधारित व्यवस्था कभी भी जनता का विश्वास नहीं जीत सकती। उनकी ये बातें आज भी उतनी ही सच हैं जितनी सालों पहले थीं। नैतिकता और ऊंचे मूल्यों के प्रति उनका समर्पण ही उन्हें दूसरों से अलग बनाता था।हमें उनसे सीखना चाहिए कि जीवन में चाहे जो भी क्षेत्र हो, शुचिता का दामन नहीं छोड़ना है। आज उनकी जन्मशती पर हम उनके इन महान विचारों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं "।

पूनम कोठारी

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पाठक की सर्वोपरिता और व्यक्तित्व की सादगी

" कुलिश जी अक्सर कहते थे कि 'अखबार कागज की एक नाजुक नाव की तरह है।' इस नाव में विश्वास का एक छोटा सा छेद भी इसे डुबो सकता है, इसलिए पाठक का भरोसा जीतना सबसे जरूरी है।उनकी नजर में अखबार का असली मालिक कोई उद्योगपति नहीं, बल्कि उसे पढ़ने वाला आम पाठक था। वे खबरों के जरिए सनसनी फैलाने के सख्त खिलाफ थे, वे सिर्फ प्रमाणिक खबरें ही चाहते थे। कुलिश जी इतने बड़े पद पर होने के बाद भी एक बहुत ही सरल और सहज इंसान थे। वे छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, हर तरह के लोगों के साथ बहुत प्यार और सादगी से मिलते थे। उनसे मिलने के बाद कोई कह नहीं सकता था कि वह राजस्थान के इतने बड़े व्यक्तित्व के सामने बैठा है। वे हमेशा आशावादी रहे और जीवन के हर उतार-चढ़ाव को मुस्कुराहट के साथ पार किया। उनका व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी जमीन से कैसे जुड़े रहना चाहिए। आज राजस्थान पत्रिका का जो विशाल रूप हम देख रहे हैं, वह उनकी इसी सादगी और मेहनत का फल है। उनकी जन्मशती पर हमारा सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि हम लोगों का विश्वास जीतना सीखें "।

प्रिया लोढ़ा

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