
चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किया।
विनय कौड़ा,
पिछले दिनों अमरीका ने चीन पर अत्यंत गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाला आरोप लगाया है, जिसने वैश्विक परमाणु संतुलन, रणनीतिक पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय भरोसे की पूरी संरचना को चुनौती दे दी है। अमरीकी अधिकारियों का दावा है कि 22 जून 2020 को चीन ने अपने शिनजियांग प्रांत स्थित लोफ नूर परीक्षण स्थल पर एक गुप्त परमाणु परीक्षण किया, जिसे सुनियोजित ढंग से अंतरराष्ट्रीय समुदाय और निगरानी तंत्र से छिपाया गया।
अमरीका ने इस आरोप को केवल एक आम बयान के रूप में नहीं रखा, बल्कि परीक्षण की सटीक तिथि और समय सार्वजनिक कर इसे तथ्यात्मक गंभीरता प्रदान की। यह स्पष्ट संकेत है कि वाशिंगटन इसे वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मानता है, न कि महज कूटनीतिक दबाव की रणनीति। यदि यह आरोप सत्य सिद्ध होता है तो यह दशकों से कायम परमाणु परीक्षण विराम की उस अनौपचारिक, लेकिन प्रभावी परंपरा को तोडऩे जैसा होगा, जिसने शीत युद्ध के बाद की दुनिया में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अमरीकी विशेषज्ञों ने जिस 'डिकपलिंग' तकनीक का उल्लेख किया है, वह विशेष रूप से चिंताजनक है। इस तकनीक के माध्यम से भूमिगत परमाणु विस्फोट के भूकंपीय संकेतों को इस प्रकार नियंत्रित किया जाता है कि वे सामान्य भू-गतिविधि जैसे प्रतीत हों। यदि किसी राष्ट्र ने इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणालियों को चकमा देने का प्रयास किया है, तो यह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था को चुनौती देने का सुनियोजित प्रयास है। यह घटना परमाणु हथियार नियंत्रण की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार करती है। इस पूरे घटनाक्रम का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अमरीका और रूस के बीच रणनीतिक परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली न्यू स्टार्ट संधि फरवरी 2026 में समाप्त हो चुकी है। इस संधि ने वर्षों तक दो प्रमुख परमाणु शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके समाप्त होते ही यदि तीसरी बड़ी शक्ति पर गुप्त परीक्षण का आरोप सामने आता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भविष्य की हथियार नियंत्रण व्यवस्था को द्विपक्षीय के बजाय त्रिपक्षीय या बहुपक्षीय स्वरूप नहीं दिया जाना चाहिए। चीन को औपचारिक नियंत्रण ढांचे में शामिल किया जाना अधिक यथार्थवादी प्रतीत होता है।
चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें राजनीतिक प्रेरित बताया है। बीजिंग ने अपनी 'नो-फर्स्ट-यूज' नीति के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई है। लेकिन समानांतर रूप से चीन की गतिविधियां अलग कहानी कहती हैं। हाल के वर्षों में नए आइसीबीएम साइलो क्षेत्रों का निर्माण, हाइपरसोनिक मिसाइलों का परीक्षण, परमाणु पनडुब्बी बेड़े का विस्तार और परमाणु भंडार में तीव्र वृद्धि जैसे संकेत तीव्र आधुनिकीकरण कार्यक्रम की ओर इशारा करते हैं। यह प्रवृत्ति चीन के 'न्यूनतम प्रतिरोध' के दावे को संदिग्ध बनाती है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि 2020 में गलवान घाटी में हुए संघर्ष ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि सीमाई तनाव अब पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। यदि उसी समय-सीमा में यह परमाणु परीक्षण हुआ तो यह एक व्यापक सामरिक संदेश का हिस्सा हो सकता है।
क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में यह निर्विवाद तथ्य है कि चीन ने दशकों तक पाकिस्तान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को खुला या परोक्ष संरक्षण दिया है। परमाणु रिएक्टरों की आपूर्ति, बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक में सहयोग और रणनीतिक ढाल प्रदान कर चीन ने दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन को जानबूझकर भारत-विरोधी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। यह समर्थन केवल तकनीकी सहायता नहीं, बल्कि भारत को घेरने की व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है। ऐसी नीतियां चीन के 'जिम्मेदार शक्ति' होने के दावों को खोखला सिद्ध करती हैं।
भारत की परमाणु नीति, नो-फर्स्ट यूज और विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध, दीर्घकाल से जिम्मेदार और संतुलित दृष्टिकोण का उदाहरण रही है। भारत ने संख्या की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय अपनी प्रतिरोधक क्षमता की उत्तरजीविता और विश्वसनीयता पर बल दिया है। त्रिस्तरीय प्रतिरोधक क्षमता (भूमि, वायु और समुद्र आधारित), कमांड-एंड-कंट्रोल संरचना की मजबूती तथा तकनीकी आधुनिकीकरण जैसे कदम इस बात के प्रमाण हैं कि भारत अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क और दूरदर्शी है। चीन की बढ़ती अपारदर्शिता और गुप्त गतिविधियां भारत के लिए संकेत हैं कि रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए निरंतर तैयारी अनिवार्य है।
भारत का उद्देश्य प्रतिस्पर्धी विस्तार नहीं, बल्कि स्थिरता सुनिश्चित करना है। वैश्विक स्तर पर यह घटना एक बड़े प्रश्न को जन्म देती है। क्या वर्तमान परमाणु ढांचा बहुध्रुवीय विश्व की वास्तविकताओं के अनुरूप है? शीत युद्ध के समय का द्विध्रुवीय संतुलन अब अप्रासंगिक हो चुका है।
चीन के गुप्त परमाणु परीक्षण का मुद्दा महज आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि वैश्विक परमाणु व्यवस्था, पारदर्शिता और शक्ति-संतुलन के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जून 2020 की घटना यदि वास्तव में एक परमाणु परीक्षण थी, तो उसका उद्देश्य और संदेश दूरगामी महत्व रखते हैं। यह बहुपक्षीय, पारदर्शी और समावेशी हथियार नियंत्रण ढांचे की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत के लिए यह समय संयम, सतर्कता और रणनीतिक दृढ़ता का है। जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में भारत ने सदैव अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान किया है लेकिन अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं किया है। भारत का लक्ष्य स्पष्ट है- राष्ट्रीय हितों की रक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता का संरक्षण व नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन।
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लव सोनकर
लव सोनकर - 9 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले 7 सालों से डिजिटल मीडिया से जुड़े हुए हैं और कई संस्थानों में अपना योगदान दि है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता ए...और पढ़ें...
Published on:
17 Feb 2026 01:51 pm

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