
करोड़ों खर्च होने के बावजूद मरम्मत में लापरवाही और भ्रष्टाचार हालात बिगाड़ रहे हैं।
सड़कें सफर के लिए सुरक्षित हों, इसके लिए सरकारें और शहरी निकाय साल-दर-साल करोड़ों रुपए का बजट सिर्फ इसलिए रखती हैं ताकि क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत हो सके। लेकिन यह तथ्य सचमुच जिम्मेदारों के लिए शर्मनाक ही कहा जाएगा कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद खबरें आती हैं कि सड़कों पर गड्ढे न केवल हादसों के सबब बन रहे हैं बल्कि लोगों की जान तक ले रहे हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़े इस डरावने सच को उजागर करने के लिए काफी हैं जिसमें बताया गया है कि हर रोज औसतन छह जनों की मौत सड़कों पर गड्ढों की वजह से हो रही हैं। वर्ष 2019 से 2023 तक इस वजह से हुए हादसों में कुल 9109 मौतें हुईं। इनमें भी अधिकाश: मौतें दुपहिया वाहन चालकों की हुई हैं।
जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले जाने वाले करों से बनी सड़कें जब आम आदमी के लिए सुरक्षित न हो तो दोष किसको दें? बात सिर्फ सड़क निर्माण की ही नहीं है। सड़कों पर गड्ढों को भरने के काम में अनदेखी ज्यादा अहम है। यह कोई ऐसा काम भी नहीं है जिसमें कोई बड़ी रकम खर्च होने वाली हो। वैसे भी सड़क निर्माण करने वाले ठेकेदार निर्धारित शर्तों के तहत मरम्मत के लिए भी बाध्य होते हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कमीशनखोरी व भ्रष्टाचार की सीढ़ी पर होने वाले निर्माण अक्सर हादसों की इबारत लिखने वाले होते हैं। मामूली बरसात में ही सड़कें किस कदर उधड़ जाती हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं।
सड़कों के गड्ढे भरने के काम में संवेदनशीलता ज्यादा जुड़ी है। इनकी रखरखाव से जुड़े लोग जब हादसों में मरने वालों के परिजनों का दर्द महसूस करेंगे तब उनको लगेगा कि जाने-अनजाने वे हत्या के अपराध में भागीदार बन रहे हैं। जहां तक हादसों में होने वाली मौतों की बात है, कई बार ओवरस्पीड और यातायात नियमों की पालना में लापरवाही की बात भी सामने आती है। लेकिन जब यह पता चले कि हादसा चालक की लापरवाही की वजह से नहीं बल्कि जिम्मेदारों की अनदेखी से हुआ तो सड़कों की गुणवत्ता निरीक्षण के दावे फीके नजर आते हैं।
सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्ग व राज्य राजमार्ग ही गुणवत्ता वाले हों, यह काफी नहीं। नगर निकायों और गांव-शहरों को सड़कों से जोड़ने वाले महकमों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। सिर्फ बरसात के बाद ही सड़कों की मरम्मत का अभियान चलाने से काम नहीं चलने वाला। दरअसल सड़कों पर बने इन मौत के गड्ढों को भरने का काम सतत रूप से होना चाहिए। अभी तो हो यह रहा है कि कोई हादसा होने पर ही जिम्मेदार हरकत में आते हैं। हादसों के बाद जांच का ऐलान और कार्रवाई के नाम पर लीपापोती से ज्यादा कुछ नहीं होता। सड़कों के गड्ढे भरने में लापरवाही करने वाले ठेकेदारों-इंजीनियरों पर सख्ती जरूरी है। यह ध्यान रखना होगा कि हर व्यक्ति की जान कीमती है और किसी दूसरे की लापरवाही से मौत होना तो अक्षम्य ही है।
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लव सोनकर
लव सोनकर - 9 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले 7 सालों से डिजिटल मीडिया से जुड़े हुए हैं और कई संस्थानों में अपना योगदान दि है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता ए...और पढ़ें...
Published on:
13 Feb 2026 02:49 pm
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