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बस्तर का अनोखा प्रेम… नेरोम के मोतियों में छिपी सदियों पुरानी प्रेम गाथा, जिसे समझने में लगते हैं युग

Abujhmad Love Culture: बस्तर की अनोखी प्रेम परंपरा में ‘नेरोम’ की माला और गोटूल की संस्कृति खास महत्व रखती है। अबूझमाड़ के जंगलों में प्रेम दिखावे का नहीं, बल्कि संवेदनाओं और सामाजिक स्वीकृति का संस्कार है।

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बस्तर का अनोखा प्रेम (photo source- Patrika)

बस्तर का अनोखा प्रेम (photo source- Patrika)

जब दुनिया 14 फरवरी का इंतज़ार करती है, तब अबूझमाड़ के जंगलों में प्रेम हर दिन सांस लेता है। यहां प्यार किसी तारीख़ का मोहताज नहीं, न ही दिखावे का उत्सव है। यह तो जीवन की लय में घुला हुआ एक संस्कार है- धीरे-धीरे, बरसों की साधना से बुना गया। अबूझमाड़… बस्तर का वह रहस्यमयी अंचल, जहां परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं, जिया जाता है। यहां प्रेम गोटूल में जन्म लेता है और “नेरोम” की माला में पिरोया जाता है।

गोटूल: जहां मन मिलते हैं…

गोटूल केवल युवाओं का सामुदायिक केंद्र नहीं, बल्कि संस्कृति का जीवंत विद्यालय है। यही वह स्थान है जहां जीवन के मूल्य, रिश्तों की गरिमा और प्रेम की पवित्रता सिखाई जाती है। यहां प्रेम शब्दों में कम, व्यवहार में अधिक दिखाई देता है। नजरों में झलकता है, मांदर की थाप पर थिरकता है और लोकगीतों की धुन में गूंजता है। गोटूल में प्रेम का इज़हार बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि संवेदना से होता है। यहां तन का नहीं, मन का मिलन होता है।

नेरोम: प्रेम की साधना

अबूझमाड़ की प्रेम परंपरा का सबसे अनोखा प्रतीक है—“नेरोम”। यह कोई साधारण माला नहीं, बल्कि वर्षों की प्रतीक्षा और विश्वास का प्रतिफल है। कहते हैं, बारह वर्ष की आयु से एक बालिका—मालको—रंग-बिरंगे नन्हे मोतियों को उम्मीद के धागों में पिरोना शुरू करती है। वह नहीं जानती कि उसका भावी जीवनसाथी कौन होगा, लेकिन हर मोती में वह एक गीत, एक सपना और एक विश्वास पिरोती जाती है। अठारह बसंत तक पहुंचते-पहुंचते वह नेरोम एक संपूर्ण प्रेम-कथा बन जाती है। हर गांठ एक वचन है, हर रंग एक भावना, हर धागा एक उम्मीद, नेरोम केवल आभूषण नहीं-यह प्रेम की तपस्या है।

मावली मेला: मौन प्रेम-पत्र

जब मावली मेला सजता है, तो मोतियारिनें अपने नेरोम को माथे से जुड़ी चांदी की क्लिप में सहेजकर उत्सव में उतरती हैं। मांदर की थाप पर जब उनके पांव थिरकते हैं, तो वह नृत्य एक मौन प्रेम-पत्र बन जाता है। कोई शब्द नहीं, कोई घोषणा नहीं-सिर्फ संकेत और संवेदना। अगर प्रेमी उस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो मालको नेरोम उसके हाथों में सौंप देती है।

यही स्वीकृति है। यही जीवन भर का वचन है। प्रेम, जो दिखाया नहीं-जिया जाता है। अबूझमाड़ का प्रेम बाज़ार की चमक-दमक से दूर है। यहां महंगे उपहार नहीं, बल्कि विश्वास की पूंजी है। महुआ के पेड़ भी जैसे इस प्रेम में बौराकर झूम उठते हैं। मांदर की थाप पर जंगल भी थिरकता है। यह प्रेम किसी प्रदर्शन का विषय नहीं। यह तो भीतर की अनुभूति है-धीमी, गहरी और स्थायी।

"प्रेम को स्वीकार करना केवल भावनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिबद्धता भी है। गोटूल में पनपा रिश्ता जब समाज की स्वीकृति पाता है, तो वह विवाह और पारिवारिक जीवन की मजबूत नींव बन जाता है- बुदकु सोरी, स्थानीय"

आधुनिक दौर में भी जीवित परंपरा

तेजी से बदलती दुनिया में जहां रिश्ते अक्सर जल्दबाजी में बनते और टूटते हैं, वहीं अबूझमाड़ की यह परंपरा धैर्य और प्रतिबद्धता का संदेश देती है। यह बताती है कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संस्कार का संगम है। नेरोम हमें याद दिलाती है कि सच्चा प्रेम समय मांगता है- साधना मांगता है।

क्यों खास है बस्तर का गोटूल?

बस्तर का गोटूल सिर्फ एक पारंपरिक भवन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मा है। यह वह सांस्कृतिक केंद्र है जहां युवा पीढ़ी जीवन, अनुशासन, जिम्मेदारी और प्रेम के मायने सीखती है। यहां प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि परंपरा, मर्यादा और सामुदायिक स्वीकृति से जुड़ा एक पवित्र बंधन है।

गोटूल में प्रेम अचानक उपजा आकर्षण नहीं होता। यह धीरे-धीरे विश्वास, साथ और समझ से विकसित होता है। यहां रिश्ते समय की कसौटी पर परखे जाते हैं। गोटूल में बनने वाले संबंध समाज की जानकारी और मर्यादा के भीतर होते हैं। इससे रिश्तों में पारदर्शिता और जिम्मेदारी बनी रहती है।

जीवन के व्यवहार से साबित होता है प्रेम

बस्तर, खासकर अबूझमाड़ क्षेत्र में, प्रेम की अभिव्यक्ति “नेरोम” (मोतियों की माला) के जरिए होती है। वर्षों तक पिरोई गई यह माला धैर्य, समर्पण और जीवनभर साथ निभाने का प्रतीक है। गोटूल में मांदर की थाप, लोकगीत, नृत्य और मेलों के माध्यम से प्रेम अभिव्यक्त होता है। यहां प्रेम व्यक्तिगत नहीं, सांस्कृतिक अनुभव है।

यहां प्यार जताने के लिए किसी खास तारीख का इंतजार नहीं किया जाता। गोटूल की परंपरा सिखाती है कि प्रेम दिखावे से नहीं, जीवन के व्यवहार से साबित होता है। आज के दौर में जहां रिश्ते त्वरित और अस्थायी होते जा रहे हैं, बस्तर का गोटूल धैर्य, प्रतिबद्धता और सामूहिक मूल्यों का संदेश देता है।

"डॉ. शिवकुमार पांडेय, साहित्यकार कहते हैं कि यहां प्यार ज़बरदस्ती नहीं होता। गोटूल में लड़का-लड़की एक-दूसरे को समझते हैं। अगर लड़की मना कर दे तो लड़का उसे स्वीकार करता है। नाराज़गी या दुश्मनी की कोई जगह नहीं होती। यहां समाज सिखाता है कि सम्मान सबसे बड़ा है। प्यार हो तो दोनों की मर्जी से, नहीं तो दोस्ती बनी रहती है।"

"डॉ. के.के. झा समाजशास्त्री कहते हैं कि हमारे यहां प्यार छुपकर नहीं, समाज के बीच पनपता है। जब लड़का-लड़की एक-दूसरे को पसंद करते हैं और ‘नेरोम’ की माला पहनाते हैं, तो इसका मतलब होता है कि दोनों ने जिम्मेदारी स्वीकार की है। इसके बाद परिवार और गांव के बुजुर्ग भी साथ खड़े होते हैं। यहां प्रेम सिर्फ दो लोगों का नहीं, पूरे समाज का रिश्ता बन जाता है।”

वहीं ग्रामीणों के अनुसार, प्रेम को स्वीकार करना केवल भावनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिबद्धता भी है। गोटूल में पनपा रिश्ता जब समाज की स्वीकृति पाता है, तो वह विवाह और पारिवारिक जीवन की मजबूत नींव बन जाता है।

क्या है नेरोम की माला?

नेरोम रंग-बिरंगे मोतियों से बनी एक विशेष माला होती है, जिसे युवती वर्षों तक धैर्य और समर्पण से पिरोती है। हर मोती उसके मन के एक भाव, एक गीत और एक सपने का प्रतीक होता है। यह माला केवल आभूषण नहीं, बल्कि प्रेम की साधना मानी जाती है।

लकड़ी की कंघी का महत्व

नेरोम के साथ एक और खास प्रतीक जुड़ा है-लकड़ी की कंघी। जब कोई युवती अपने प्रेम को स्वीकार करती है या अपने भावी जीवनसाथी को चुनती है, तो वह उसे लकड़ी की कंघी भेंट करती है। यह कंघी सामान्य वस्तु नहीं, बल्कि विश्वास और समर्पण का प्रतीक होती है। कंघी का अर्थ है यह है कि मैं तुम्हें अपने जीवन का हिस्सा मानती हूं। तुम्हें अपने सबसे निजी और सम्मानित स्थान में जगह देती हूं। यह संबंध विश्वास और जिम्मेदारी पर आधारित है।

कैसे होती है प्रेम की स्वीकृति?

मेलों या पारंपरिक उत्सवों के दौरान, जब दोनों पक्षों की सहमति बनती है, तो युवती नेरोम माला और लकड़ी की कंघी अपने प्रेमी को सौंपती है। यह क्षण शब्दों से ज्यादा मौन और संकेतों में व्यक्त होता है। कंघी स्वीकार करना प्रेमी की ओर से इस रिश्ते को सम्मानपूर्वक स्वीकार करने का संकेत होता है।

क्यों खास है यह परंपरा?

इसमें दिखावा नहीं, बल्कि गहरी भावनात्मक प्रतिबद्धता होती है।

प्रेम को सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यता मिलती है।

यह संबंध को पवित्र और दीर्घकालिक बनाने का प्रतीक है।

प्रेम जो जिया जाता है

नेरोम और लकड़ी की कंघी की यह परंपरा बताती है कि बस्तर का प्रेम बाजारू नहीं, बल्कि मूल्यों से जुड़ा हुआ है। यहां प्रेम उपहार से नहीं, प्रतीक से व्यक्त होता है-और वह प्रतीक जीवनभर का वचन बन जाता है। यही कारण है कि अबूझमाड़ का प्रेम आज भी अपनी जड़ों के साथ जीवित है-संवेदनशील, सादगीपूर्ण और गहरा।

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लव सोनकर

लव सोनकर - 9 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले 7 सालों से डिजिटल मीडिया से जुड़े हुए हैं और कई संस्थानों में अपना योगदान दि है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता ए...और पढ़ें...


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