AI-generated Summary, Reviewed by Patrika
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New Year 2026 Special : भारत में 80-90 के दशक में ग्रीटिंग कार्ड का क्रेज गजब का था। उस दौर की फिल्में हों या फिर, नया साल या वैलेंटाइन डे ये ग्रीटिंग कार्ड्स दिखते थे। ऐसा करने के पीछे एक भारतीय था जो सड़के किनारे पोस्टर बेचता था। फिर उसने 5 हजार रुपए कर्ज लेकर ग्रीटिंग कार्ड का बिजनेस शुरू किया और देखते-देखते ग्रीटिंग कार्ड भारत के घर-घर पहुंचा और वो शख्स करोड़ों की कंपनी का मालिक बन गया। चलिए, नए साल 2026 (Happy New Year 2026) के मौके पर ग्रीटिंग कार्ड के इतिहास से लेकर भारत में छाने तक की कहानी पढ़ते हैं।
चलिए, 19वीं सदी के ब्रिटेन में चलते हैं। लंदन में रहने वाले सर हेनरी कोल (Sir Henry Cole) सरकारी अधिकारी थे। उस दौर में क्रिसमस के मौके पर हाथ से लंबे-लंबे पत्र लिखकर शुभकामनाएं भेजी जाती थीं। हेनरी काफी मिलनसार और प्रभावी शख्स थे, लोगों इसी कारण उनको पसंद करते थे। दिसंबर 1843 में हेनरी कोल के पास इतने पत्र जमा हो गए थे कि उनका जवाब देना असंभव लग रहा था।
ऐसे समय में उन्होंने कुछ नया करने का सोचा जिससे कम समय में सभी लोगों को भेजे जा सके।

इस काम को करने के लिए उन्होंने अपने मित्र और मशहूर कलाकार जॉन कैलकॉट हॉर्सले (John Callcott Horsley) को बुलाया। मित्र को हेनरी ने कहा कि एक चित्र तैयार करो और हॉर्सले ने एक कार्ड डिजाइन किया जिसमें एक परिवार जश्न मना रहा था। उस कार्ड के नीचे लिखा था: "A Merry Christmas and a Happy New Year to You"।
ये देखकर हेनरी का दिल खुश हो गया। वो जैसा चाहते थे वैसा ही कुछ उनके मित्र ने तैयार कर दिया था। बस फिर देर क्यों करना। हेनरी कोल ने ऐसे 1 हजार कार्ड छपवाए और उन्हें अपने दोस्तों को भेजा। साथ ही जो कार्ड बच गए, उन्होंने एक शिलिंग में बेच दिया। इस तरह से दुनिया का पहला कमर्शियल ग्रीटिंग कार्ड आया था।
ग्रीटिंग कार्ड्स तो माध्यम मात्र हैं, क्योंकि संदेश देने की परंपरा प्राचीन समय से रही है। प्राचीन मिस्र में लोग पेपिरस के पत्तों पर मैसेज लिखकर भेजते थे, जबकि चीन में 'लूनर न्यू ईयर' पर विशेज भेजने का काम करते थे। मध्यकालीन यूरोप में हाथ से बने कार्ड्स का ट्रेंड था, लेकिन ये बहुत महंगे थे। इसलिए अमीर लोग तक ही सीमित रह गया।
कागज के वैलेंटाइन कार्ड्स का इतिहास 16वीं शताब्दी से मिलता है। पहला प्रिंटेड वैलेंटाइन शायद 'ए वैलेंटाइन राइटर' (A Valentine Writer) पुस्तक का मुखपृष्ठ (frontispiece) रहा होगा। यह कविताओं की किताब 1669 में जारी की गई थी।
1800 में फ्रांसेस्को बार्टोलोजी जैसे कलाकारों द्वारा बनाए गए हाथ से पेंट किए गए कॉपरप्लेट्स (तांबे की प्लेटों पर नक्काशी) की काफी मांग बढ़ गई थी।
वहीं, 1840 में इंग्लैंड में 'पेनी पोस्टेज' (सस्ती डाक सेवा) और लिफाफों की शुरुआत के साथ ही वैलेंटाइन कार्ड्स का आदान-प्रदान और बढ़ गया।
ब्रिटिशर्स के साथ ही भारत में ग्रीटिंग कार्ड्स की एंट्री हुई थी। ग्रीटिंग कार्ड को भारत में लेकर वही आए थे। 19वीं सदी के अंत में जब अंग्रेज भारत में बसने लगे थे। उनके लिए क्रिसमस और नए साल पर इंग्लैंड से कार्ड आते-जाते थे। फिर, भारत के शाही परिवारों में वो कार्ड्स जाने लगे थे।
हम भारतीयों को संदेश भेजना बहुत पसंद है। इसलिए, हमारे यहां के प्रिंटिंग प्रेसों में त्योहार के हिसाब से बी ग्रीटिंग कार्ड्स छपने लगे।

साल 1979 में दिल्ली के बीए पास एक 19 साल के लड़के ने भारत में ग्रीटिंग कार्ड के बिजनेस से कमाल कर दिया। अनिल मूलचंदानी नाम का लड़का, पोस्टर बेचने का काम करता था। अपने घर की साड़ी दुकान पर पिता का हाथ बंटाता था। फिर, उसके दिमाग में आईडिया आया और 1981 में दिल्ली के कमला नगर में पांच हजार उधार लेकर छोटी सी दुकान खोली। यहीं से शुरू हुआ ग्रीटिंग कार्ड का कारोबार।
ये लड़का आर्चीज नाम की कंपनी को 5 हजार से शुरू किया और 100 करोड़ तक लेकर गया। आज सोशल मीडिया के दौर में भी इस कंपनी वैल्यू करीब 70 करोड़ रुपए बताई जाती है। इसी कंपनी की देन है कि भारत के घर-घर में ग्रीटिंग कार्ड पहुंचे थे।
ग्रीटिंग कार्ड्स का चलन कम हुआ, खत्म नहीं। आज भी कई ऑनलाइन गिफ्टिंग स्टोर पर ग्रीटिंग कार्ड्स बिक रहे हैं। इस हिसाब से ये कहना गलत होगा कि ग्रीटिंग कार्ड्स का दौर खत्म हो गया है।
क्या आप आज भी ग्रीटिंग कार्ड्स के जरिए संदेश भेजते हैं?
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लव सोनकर
लव सोनकर - 9 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले 7 सालों से डिजिटल मीडिया से जुड़े हुए हैं और कई संस्थानों में अपना योगदान दि है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता ए...और पढ़ें...
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Published on:
01 Jan 2026 07:00 am


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