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राजस्थान के थेवा आभूषणों की अचानक बढ़ी डिमांड, रंगीन कांच पर की जाती है सोने की नक्काशी: जानिए खासियत

Thewa jewellery: महंगे आभूषणों के स्थान पर राजस्थान के प्रतापगढ़ की थेवा कला से बने आभूषणों का एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिससे गत कुछ दिनों से यहां के थेवा आभूषणों की मांग लगातार बढ़ती जा रहा है।

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Thewa jewellery

Thewa jewellery. Photo- Patrika

Thewa jewellery: प्रतापगढ़। सोने और चांदी के बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। ऐसे में आम लोगों का सोने-चांदी के आभूषण खरीदना काफी मुश्किल हो गया है।

वहीं दूसरी ओर महंगे आभूषणों के स्थान पर राजस्थान के प्रतापगढ़ की थेवा कला से बने आभूषणों का एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिससे गत कुछ दिनों से यहां के थेवा आभूषणों की मांग लगातार बढ़ती जा रहा है।

बतौर थेवा कारीगरों के गत दिनों से देशभर से उनके पास मांग एका एक बढ़ गई है। जिससे अब यहां के कारीगरों के पास मांग के मुकाबले आपूर्ति अधिक होने का दबाव बना हुआ है।

गौरतलब है कि थेवा के आभूषणों में चांदी और सोना काफी कम होता है। जबकि मजदूरी उसमें काफी ज्यादा होती है। थेवा कला से बने आभूषण अत्यंत आकर्षक और पारंपरिक होते हैं।

ये आभूषण दिखने में काफी आकर्षक होते है। इस कारण सोने के आभूषण के विकल्प के रूप में पसंद किए जा रहे है। अभी यहां के थेवा कलाकारों के पास मांग काफी है और थेवा कला के ऑर्डर बढ़ गए हैं।

कांच पर सिर्फ सोने और चांदी का कार्य

गौरतलब है कि थेवा कला में रंगीन कांच पर सोने की नक्काशी की जाती है। जबकि बाहरी आवरण चांदी का होता है, उस पर सोने की चमक होती है। ऐसे में यह दोनों धातुओं से बनाया जाता है।

इसमें चांदी व सोने दोनों के काम होता है, जबकि आभूषणों से सस्ता पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थेवा कलाकार विष्णु सोनी ने बताया कि इसमें मांग अभी बढ़ती जा रही है। नई-नई डिजाइन भी इसमें अभी बहुत चल रही हैं।

थेवा की अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान

प्रतापगढ़ की थेवा कला की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। वर्ष 2004 में थेवा कलाकार विष्णु सोनी को यूनेस्को की ओर से सील ऑफ एक्सिलेंट फॉर हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट इन साउथ एशिया के पुरुस्कार से सम्मानित किया था।

वहीं महेश राज सोनी वर्ष 2025 में भारत सरकार की ओर पद्मश्री से नवाजा जा चुका है। जबकि राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय कई पुरुस्कार यहां के कलाकारों को मिल चुके है।

यह बनते हैं आभूषण

इस कला से कई प्रकार के आभूषण बनाए जाते हैं। जिसमें गले का हार, कान के झुमके, हथफूल, ब्रेसलेट, कड़े, चूड़ियां, रकड़ी, भूजबंद, सिसपट्टी, अंगूठी, पायजेब, बिछिया व पूजा सामग्री, सजावटी वस्तुएं आदि बनाए जाते हैं। इसके अलावा देवी, देवताओं की आकृतियां, फूल-पत्तियों की बारीक डिजाइन उकेरी जाती हैं।