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Shri Ram Raksha Stotram : सफलता का गुप्त मंत्र, जानिए कैसे यह प्राचीन स्तोत्र आपके मार्ग की हर बाधा को करता है दूर

Sri Ramaraksha Stotram : श्रीरामरक्षास्तोत्रम् का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, पाठ विधि, आध्यात्मिक लाभ और महत्व पढ़ें। यह स्तोत्र भय, रोग और नकारात्मकता से रक्षा करता है।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jan 08, 2026

Shri Ram Raksha Stotram

Shri Ram Raksha Stotram : श्रीरामरक्षास्तोत्रम् सम्पूर्ण पाठ

Shri Ram Raksha Stotram in Hindi : श्रीरामरक्षास्तोत्रम् सनातन परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और चमत्कारी स्तोत्र है, जिसकी रचना ऋषि बुधकौशिक ने की थी। यह स्तोत्र भगवान श्रीराम की सर्वांगीण रक्षा-कवच के रूप में माना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करता है, वह भय, रोग, शत्रु बाधा, नकारात्मक शक्तियों और पापों से सुरक्षित रहता है।

यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि जीवन में साहस, सफलता, दीर्घायु और मोक्ष की भावना भी जागृत करता है। श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने का यह एक सरल और शक्तिशाली साधन है। कलियुग में रामनाम को सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना गया है और श्रीरामरक्षास्तोत्रम् उसी रामनाम की दिव्य शक्ति का सजीव रूप है।

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Shri Ram Raksha Stotram)

श्रीगणेशायनम:।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषि: श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्द: सीता शक्ति: श्रीमद्हनुमान् कीलकम् श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोग:॥

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं।

पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्॥
वामाङ्कारूढ-सीता-मुखकमल-मिलल्लोचनं नीरदाभं।

नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।

एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।

जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥2॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्।

स्वलीलया जगत्त्रातु-माविर्भूतमजं विभुम्॥3॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्।

शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज:॥4॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती।

घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल:॥5॥
जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवन्दित:।

स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक:॥6॥
करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।

मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय:॥7॥
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु:।

ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्॥8॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तक:।

पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु:॥9॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत्।

स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥10॥
पाताल-भूतल-व्योम-चारिणश्छद्मचारिण:।

न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि:॥11॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।

नरो न लिप्यते पापै: भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥12॥
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाऽभिरक्षितम्।

य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय:॥13॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।

अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥14॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर:।

तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक:॥15॥
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्।

अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु:॥16॥
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।

पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥17॥
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।

पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥18॥
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।

रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥19॥
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशावक्षया शुगनिषङ्ग सङिगनौ।

रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत:पथि सदैव गच्छताम्॥20॥
संनद्ध: कवचीखड्गी चापबाणधरो युवा।

गच्छन् मनोरथानश्च राम: पातु सलक्ष्मण:॥21॥
रामो दाशरथि: शूरोलक्ष्मणानुचरो बली।

काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण:कौसल्येयो रघूत्तम:॥22॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम:।

जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम:॥23॥
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित:।

अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्यनोति न संशय:॥24॥
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्।

स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर:॥25॥
रामं लक्ष्मण-पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरं।

काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथ-तनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं।

वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥26॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।

रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:॥27॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।

श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥28॥

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