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शहादत को सलाम: शहीद रामेश्वर लाल का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाया परिवार, 39 साल से सता रही पीड़ा

Shahadat Ko Salam: सीकर जिले के रामपुरा निवासी शहीद रामेश्वर लाल ने 1986 में ऑपरेशन मेघदूत के दौरान लेह-लद्दाख में हिमस्खलन में शहादत दी। 39 साल बीतने के बाद भी परिवार उनके अंतिम संस्कार नहीं कर पाने का गम झेल रहा है।

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सीकर

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Arvind Rao

Jan 09, 2026

Shahadat Ko Salam Sikar Martyred Rameshwar Lal

शहीद वीरांगना भंवरी को पत्रिका कार्यालय में सम्मानित करते हुए (फोटो- पत्रिका)

Shahadat Ko Salam: सीकर: जब सरहदों पर तैनात कोई जवान देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाता है, तब देशवासी चैन की नींद सो पाते हैं। दुश्मन की तोप हो, बर्फीले तूफान हो या भीषण गर्मी की तपिश, उस जवान का तो एक ही संकल्प देश की आन, बान और शान की रक्षा करना होता है।

लेकिन कभी-कभी यह जुनून ऐसी शहादत में बदल जाता है, जिसमें वीर का नामो-निशान तक शेष नहीं रहता। ऐसी ही एक अमर गाथा है, सीकर जिले के रामपुरा निवासी शहीद रामेश्वर लाल की। जिनकी शहादत को 39 साल बीत चुके हैं, लेकिन परिवार को आज भी उनके अंतिम संस्कार तक अपने हाथ से नहीं कर पाने का गम सता रहा है।

12 साल सेवा के बाद हिमस्खनल में हुई शहादत

दिसंबर 1955 में जन्मे रामेश्वर लाल बचपन से ही सेना में जाने का सपना पाले हुए थे। देशभक्ति से ओत-प्रोत रामेश्वर लाल ने 19 वर्ष की उम्र में ये संकल्प पूरा कर 12 साल तक भारतीय सेना में सेवाएं दी। लेकिन, वर्ष 1986 में ऑपरेशन मेघदूत के दौरान उनकी तैनाती लेह-लद्दाख की बर्फीली और दुर्गम सरहदों पर की गई।

जहां वे दिन-रात सीना तानें देश की सुरक्षा में फौलादी दीवार की तरह तने रहे। लेकिन, 26 मई 1986 को ड्यूटी के दौरान अचानक हुए भीषण हिमस्खलन में उनकी देह देश के नाम हो गई। सेना और साथियों ने काफी तलाश की, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला। जब परिवार को 15 दिन बाद उनके शहादत की सूचना मिली तो पूरे गांव में गर्व के साथ गम का माहौल छा गया।

शहादत के बाद टूटा दुखों का पहाड़

शहीद के बलिदान के साथ ही परिवार पर दुखों और अभावों का पहाड़ टूट पड़ा। वीरांगना भंवरी के सामने तीन से सात वर्ष की उम्र के तीन बच्चों के पालन-पोषण की बड़ी चुनौती थी। सीमित संसाधनों में उन्होंने जैसे-तैसे परिवार को संभाला, लेकिन शहादत का घाव और अंतिम संस्कार न हो पाने की पीड़ा आज भी हृदय को सालती है।

इसके बाद भी शहीद वीरांगना का हौसला कम नहीं हुआ। शहीद के बड़े बेटे राजेंद्र कुमार नागा सेना में शामिल होकर देशसेवा कर चुके हैं। छोटे बेटे मनोज कुमार नागा को बुधवार को चालक के पद पर नौकरी मिली है। बेटी रोशन ससुराल में पारिवारिक जिम्मेदारी संभाल रही हैं।

स्मारक और स्कूल के नामकरण की मांग

परिवार को इस बात का भी गहरा दुख है कि अब तक शहीद रामेश्वर लाल के नाम पर न तो कोई स्मारक बना और न ही किसी विद्यालय का नामकरण हो सका। परिजन सवाल उठाते हैं कि जब एक जवान बिना किसी भेदभाव के देश के हर नागरिक की रक्षा करता है, तो उसकी शहादत के बाद उसके परिवार को पूरा सम्मान और न्याय क्यों नहीं मिल पाता?

आज भी सम्मान की राह देखता परिवार

39 वर्ष बाद भी शहीद रामेश्वर लाल का परिवार सिर्फ सम्मान, पहचान और न्याय की मांग कर रहा है। ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि इस मिट्टी के लिए एक लाल ऐसा भी था, जिसने अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया, लेकिन उसकी शहादत आज भी व्यवस्था के पन्नों में पूरा स्थान पाने को तरस रही है।

शहादत को सलाम कार्यक्रम का आगाज

राजस्थान पत्रिका के शहादत को सलाम मुहिम का आगाज गुरुवार को शेखावाटी की माटी से हुआ। पत्रिका अभियान के तहत शहीद वीरांगना भंवरी को पत्रिका कार्यालय में सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में वीरांगना ने पत्रिका की पहल की सराहना की। इस दौरान फूले बिग्रेड के प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश सैनी, संभाग प्रभारी नरेश मिटावा और जिला प्रभारी रमेश पंवार आदि मौजूद रहे।