
मुहम्मद यूनुस, शेख हसीना और खालिदा जिया। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)
Bangladesh Election History: बांग्लादेश का राजनीतिक इतिहास हमेशा से उथल-पुथल, संघर्ष और खूनखराबे से भरा हुआ रहा है। 1971 में पाकिस्तान से आजादी मिलने के बाद से लेकर 2026 के मौजूदा चुनावों तक (Bangladesh Election History), इस देश ने लोकतंत्र और सैन्य शासन के बीच लंबी आंख-मिचौली देखी है। आज जब बांग्लादेश एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है, तो इसके पिछले पांच दशकों के सियासी सफर को समझना बेहद जरूरी है।
बांग्लादेश का जन्म 1971 में एक खूनी मुक्ति संग्राम के बाद हुआ। शेख मुजीबुर रहमान देश के पहले नेता बने और अवामी लीग ने सत्ता संभाली। हालांकि, यह स्थिरता ज्यादा दिन नहीं टिकी। 1975 में एक सैन्य तख्तापलट में शेख मुजीब और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई। यह बांग्लादेश के इतिहास का सबसे काला अध्याय था, जिसने देश को लंबी राजनीतिक अस्थिरता में धकेल दिया।
मुजीब की हत्या के बाद सेना ने कमान संभाली। जनरल जियाउर रहमान सत्ता में आए और उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की स्थापना की। लेकिन 1981 में उनकी भी हत्या कर दी गई। इसके बाद जनरल एच.एम. इरशाद ने सत्ता हथिया ली और करीब एक दशक तक शासन किया। 1990 में एक जन-आंदोलन के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, जिससे दोबारा लोकतंत्र की बहाली का रास्ता साफ हुआ।
सन 1991 में लोकतंत्र की वापसी हुई और यहीं से 'दो बेगमों'-खालिदा जिया (बीएनपी) और शेख हसीना (अवामी लीग)—के बीच राजनीतिक वर्चस्व की जंग शुरू हुई।
1991 और 2001 में खालिदा जिया (Khaleda Zia) प्रधानमंत्री बनीं।
1996 में शेख हसीना ने सत्ता संभाली। इस दौर में सत्ता परिवर्तन चुनाव के जरिए होता रहा, लेकिन हिंसा और हड़तालें आम थीं। 2007 में सेना समर्थित कार्यवाहक सरकार ने हस्तक्षेप किया और दोनों नेताओं को जेल में डाल दिया, लेकिन 2008 में फिर चुनाव हुए।
साल 2009 में शेख हसीना भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटीं। इसके बाद उन्होंने लगातार 15 वर्षों तक शासन किया। हालांकि, 2014, 2018 और 2024 के चुनाव विवादों में रहे। विपक्ष ने इन चुनावों का बहिष्कार किया और धांधली के आरोप लगाए। 2024 में छात्र आंदोलन ने एक बड़ा रूप ले लिया, जिसके चलते शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और उनके शासन का अंत हुआ।
हसीना के जाने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी। उनका मुख्य काम संस्थाओं में सुधार करना और निष्पक्ष चुनाव कराना था। 2026 का चुनाव इसी सुधार प्रक्रिया का परिणाम है, जिसे बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए 'लिटमस टेस्ट' माना जा रहा है।
दोनों ढाका की सड़कों पर आम लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया है। एक तरफ युवा मतदाता, जो 2024 की क्रांति का हिस्सा थे, वे इसे अपनी जीत मान रहे हैं और एक पारदर्शी सरकार की उम्मीद कर रहे हैं। वहीं, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल इसे अपनी वापसी का मौका मान रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोग अब वंशवाद की राजनीति से ऊब चुके हैं और नए चेहरों की तलाश में हैं। हालांकि, पुरानी रंजिशों के कारण हिंसा की आशंका भी लोगों के मन में बनी हुई है।
चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे बड़ी चुनौती सरकार गठन की होगी।
गठबंधन की राजनीति: अगर किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो जोड़-तोड़ की राजनीति तेज होगी।
सेना की भूमिका: बांग्लादेश की राजनीति में सेना हमेशा एक 'साइलेंट प्लेयर' रही है। नई सरकार के साथ सेना के समीकरण कैसे रहते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
आर्थिक सुधार: नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई और बेरोजगारी से निपटना होगा, जो पिछले दो सालों में चरम पर है।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'जेन-जी' (Gen-Z) और छात्र नेताओं का मुख्यधारा की राजनीति में आना है। 1952 के भाषा आंदोलन और 1971 के मुक्ति संग्राम की तरह, 2024-26 के दौर में भी छात्रों ने ही बदलाव की नींव रखी। कई छात्र नेता अब निर्दलीय या नई पार्टियों के जरिए संसद पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। यह बांग्लादेश की पारंपरिक राजनीति के लिए एक खतरे की घंटी भी है और उम्मीद की किरण भी।
Published on:
08 Feb 2026 12:53 pm
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