
पढ़ाई के लिए दूध, बर्फ और साइकिल पर फेरी लगाकर किताब बेची
भिवाड़ी. रामलाल गिरधर का जन्म 26 जनवरी 1952 को गांव सीवन जिला कैथल में हुआ, पिता ठाकरदास गिरधर की राशन दुकान थी, पिता पाकिस्तान में मुल्तान से आए थे। माताजी 1964 में हम बच्चों को लेकर दिल्ली आ गई, उस समय में आठवीं का छात्र था। पढऩे के लिए पैसे नहीं थे। पिताजी गांव ही रहते थे। माताजी स्वेटर बुनने लगीं, उन्हें प्रति स्वेटर एक-दो रुपए मिलते थे। तभी मैंने सोचा कि कुछ काम करूं। कक्षा नौ में स्कूल जाने से पहले घर के आगे दूध बेचना शुरू किया। इस तरह पांच से सात रुपए रोज कमाने लगा। एक साल बाद स्कूल से आने के बाद शादीपुर डिपो के सामने बर्फ बेचना शुरू किया। इससे भी पांच सात रुपए मिल जाते थे। कक्षा 11 में आने के बाद पढ़ाई का बोझ बढ़ गया, इसलिए दूध और बर्फ बेचना बंद कर दिया। 11वीं के पेपर देने के बाद मैंने और मित्र सतीश ओबराय ने सोचा कि अब क्या किया जाए। यूपीएससी गेट के सामने प्रतियोगी परीक्षा की किताब बिकती थी, हम साइकिल पर रखकर किताब ले जाते और वहां बेचते। ये स्थान घर से 20 किमी दूर था, इसलिए एक दिन सतीश और एक दिन मैं जाता था। दिल्ली विवि से पत्राचार से बीए करने लगा। बुक बेचकर पैसे जोड़े, कालिंदी कॉलेज के पास दुकान किराए पर ली। वहां किताब बेचना शुरू किया। प्रतियोगी परीक्षा के दस वर्षीय पेपर खुद पब्लिश कराकर बेचना शुरू किया। एक-दो सामान्य ज्ञान की किताब भी बनाकर छपवाई और बेची। इस तरह हमारा काम आगे बढ़ा। मेहनत खूब करते थे, कोई शर्म नहीं करते। 1979 में भाई के साथ मोतीनगर में किराने की दुकान चलाने लगा। किताब की दुकान मित्र को ही सौंप दी। राशन सामग्री के लिए उधार पैसे लेकर सन 80 में जेएल रोड पर नई दुकान शुरू की। काम बढ़ता गया और पैसे की तंगी आ गई। दो दोस्त थे उन्होंने मदद की और पैसे दिए।
इस तरह आए उत्पादन में
एक दोस्त थे जो कि हमें एक कंपनी का माल देते थे। उन्होंने कहा कि मैंने एक उत्पादन की कंपनी हरिनगर दिल्ली में बनाई है। उन्होंने 1996 में कंपनी बनाई थी, सन 2000 में हम उनके साथ साझेदार हो गए। कंपनी भुना दलिया और इलायची सहित अन्य सामान पैक कर बेचती थी। इसी वर्ष हम भिवाड़ी आ गए, दिल्ली से सारा काम भिवाड़ी शिफ्ट कर लिया और साथ में एक सोयाबरी की मशीन लगाई। 2008 में मित्र ने कहा कि मैं ये काम नहीं करूंगा, मित्र अलग हो गए। हमारा सोयाबरी का काम अच्छा चला और साल में एक से सवा करोड़ का टर्नओवर हो गया। इसके बाद काम आगे बढ़ाया, वितरक बनाना शुरू किया। बाहर से माल लेकर रीपैकेजिंग करने लगे। अब हमारी भिवाड़ी में तीन फैक्ट्रियां हैं। दो सौ कर्मचारी काम करते हैं। अब हमारा टर्नओवर करीब सौ करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
कर्मचारी हमारा परिवार
रामलाल कहते हैं कि मेहनत, लगन और परिश्रम से ही सफलता मिलती है। किसी अमीर और सफल व्यक्ति को देखें तो उसने जीवन में कितना कठिन परिश्रम किया है, इसके बारे में जरूर जानें। जीवन के सफर में मुश्किल भी आएगी और सहयोग भी मिलेगा। सरकार को टैक्स देने में कोई कंजूसी नहीं करनी चाहिए, इससे भी सफलता मिलती है। आज मेरी उम्र 74 साल हो चुकी है लेकिन मुझे कोई काम करने में गुरेज नहीं होता। फैक्ट्री में सफाई करनी हो या अन्य कोई काम खुद करने लगता हूं। इससे कर्मचारी प्रोत्साहित होते हैं और हम स्वस्थ रहते हैं। कर्मचारी हमारे व्यवहार से खुश हैं इसलिए 35 साल पुराने कर्मचारी भी हैं। कर्मचारियों को परिवार की तरह रखते हैं।
Published on:
02 Feb 2026 06:15 pm
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