
फिल्म 'बागबान' (सोर्स: IMDb)
Gen Z Calls Amitabh Bachchan Real Villain: रवि चोपड़ा की फेमस पारिवारिक ड्रामा फिल्म 'बागबान' (2003) को अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की जोड़ी ने काफी लोकप्रियता दिलाई थी। माता-पिता और बच्चों के बीच रिश्तों की मार्मिक कहानी ने दर्शकों के दिलों को झकझोरा था। हालांकि, फिल्म में बच्चों द्वारा अपने माता-पिता की उपेक्षा को दर्शाने वाले संदेश को लेकर अब 23 साल बाद एक नया दृष्टिकोण उभर कर सामने आया है।
हालिया में अमिताभ बच्चन के बेटे संजय मल्होत्रा के किरदार समीर सोनी ने अपने इंस्टाग्राम पर एक Gen-Z कंटेंट क्रिएटर के जरिए बनाया गया एक वीडियो शेयर किया। बता दें, वीडियो में फिल्म की कहानी को नई तरह से देखने का आग्रह किया है और विशेष रूप से समीर सोनी के किरदार को सही बताया है। बता दें, वीडियो में क्रिएटर का कहना है कि समीर सोनी का किरदार एक ‘ग्रीन फ्लैग’ यानी सही और सहायक पति की तरह है और वो अपनी पत्नी की बात सुनता है, समय पर घर आता है, उसकी एनिवर्सरी याद रखता है और दोनों के बीच स्वस्थ संवाद होता है। साथ ही, वो अपनी पत्नी से बैंक की सेविंग्स और भविष्य की योजना जैसे मुद्दे पर सीधी बात करता है, जो कि बहुत जरूरी भी है।
इतना ही नहीं, इस वीडियो में अमिताभ बच्चन के किरदार की खूब आलोचना भी होती है, खासकर उनके घर में सुबह-शाम टाइपराइटर बजाने के तरीके पर और बताया जाता है कि उनकी आदतें परिवार के बाकी सदस्यों के लिए परेशानी का कारण बनती हैं, जबकि वे रिटायर्ड व्यक्ति हैं और उनके पास अपना समय होता है। इसी वजह से वीडियो में ये भी कहा गया है कि उनके बच्चे जिन्हें ऑफिस जाना होता है, उन्हें नींद और आराम चाहिए क्योंकि वे सुबह जल्दी उठते हैं।
बता दें, इस नए नजरिए ने दर्शकों के बीच गहरी बहस छेड़ दी है। कई लोगों ने इस वीडियो के सपोर्ट में कमेंट किए और फिल्म की पुरानी पीढ़ी की इस व्याख्या पर पुनर्विचार किया है। जिस पर एक यूजर ने कमेंट कर लिखा, "बिल्कुल सही कहा आपने," तो वहीं दूसरे यूजर ने कहा, "बागबान को लेकर मेरा नजरिया बदल गया, मैं अब टीम चिल्ड्रन में हूं।" तो तीसरे ने स्वीकार किया कि फिल्म देखने पर बच्चों के लिए अपराधबोध का भाव जोरदार था, लेकिन अब सोशल मीडिया की नई सोच ने कहानी के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डाल दी है।
फिल्म 'बागबान' में सलमान खान ने भी अमिताभ बच्चन के गोद लिए पुत्र की रोल निभाई थी, लेकिन आज की पीढ़ी की नजर में ये कहानी कई मायनों में चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। नया कंटेंट और नई सोच फिल्म के पारंपरिक दृष्टिकोण को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ परिवार, रिश्तों और जिम्मेदारी की जटिलताओं को समझने में भी मदद कर रही है। इस चर्चा से ये साफ होता है कि समय के साथ कहानियों की व्याख्या भी बदलती रहती है और फिल्मों के सामाजिक संदेशों को कई बार नए संदर्भ में देखना आवश्यक हो जाता है। 'बागबान' की इस नई बहस ने परिवार और रिश्तों पर विचार करने का एक नया अवसर पेश किया है।
Updated on:
10 Feb 2026 02:19 pm
Published on:
10 Feb 2026 12:51 pm
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