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सूरज छतरी : बूंदी की आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम

छोटीकाशी बूंदी की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित सूरज छतरी आज घुमने के लिए लोगों की पहली पंसद बनी हुई है। यह स्थान ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक अनुभव का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। अनोखी बात यह है कि सूर्य की किरणें सीधे इसी छतरी पर सबसे पहले पड़ती है।

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सूरज छतरी : बूंदी की आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम

सूरज छतरी

बूंदी. छोटीकाशी बूंदी की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित सूरज छतरी आज घुमने के लिए लोगों की पहली पंसद बनी हुई है। यह स्थान ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक अनुभव का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। अनोखी बात यह है कि सूर्य की किरणें सीधे इसी छतरी पर सबसे पहले पड़ती है। यदि इस धरोहर को सही संरक्षण और प्रचार मिले तो यह बूंदी के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकती है और आने वाली पीढिय़ों को अपने इतिहास से जोडऩे का कार्य करती रहेगी। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां का नजारा अत्यंत मनमोहक होता है,जो पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र है।

दो प्रमुख रास्ते उपलब्ध
सूरज छतरी जाने के लिए दो प्रमुख रास्ते उपलब्ध हैं। पहला पैदल मार्ग बालचंदपाड़ा में हनुमान मंदिर के पीछे से जाता है। यह सूरज छतरी तक पहुंचने का सबसे सुलभ पैदल मार्ग माना जाता है। जहां से लगभग 1.5 किलोमीटर की चढ़ाई कर स्थल तक पहुंचा जा सकता है। वर्तमान में यह क्षेत्र रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है, जहां बाघ का मूवमेंट रहता है। ऐसी स्थिति में पैदल यात्रा करने से पहले वन विभाग से अनुमति लेना आवश्यक है। दूसरा मार्ग टीवी टावर के पीछे से जाता है। इस रास्ते से पर्यटक जंगल सफारी का आनंद भी ले सकते है।

संरक्षण का कार्य
वर्ष 2018 से सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन द्वारा सूरज छतरी के संरक्षण और जनजागरूकता के लिए निरंतर कार्य कर रही है। सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन के चेयरमैन अरिहंत सिंह चरड़ास बताते है कि संस्था द्धारा नियमित रूप से यहां पूजा-अर्चना, जनजागरूकता अभियान और विरासत संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। कोरोना काल के बाद से यहां बुस्ट मिला। तब हजारों लोगों ने सूरज छतरी से सूर्योदय के दर्शन किए। हाल ही में सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन के चेयरमैन के प्रयासों से सूरज छतरी एवं मयूर छतरी (मोरड़ी) के संयुक्त जीर्णोद्धार एवं संरक्षण के लिए 25 लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई है।

सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र
सूरज छतरी का निर्माण वर्ष 1673 में राव भाव ङ्क्षसह की माता द्वारा अपने पति राव छत्रशाल ङ्क्षसह की स्मृति में कराया गया था। यह स्थल प्राचीन काल से सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां स्थापित भगवान सूर्य नारायण की प्रतिमा सात घोड़ों के रथ पर आरूढ़ है,जो भारतीय स्थापत्य कला और धार्मिक प्रतीकवाद का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। छतरी परिसर में अंकित शिलालेख उस समय की ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करते हैं।