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Budget 2026: फिल्मों की टिकट सस्ती हुई या महंगी? बॉक्स ऑफिस के लिए बजट 2026 रहा ‘सुपरफ्लॉप’

Union Budget 2026: बजट 2026 फिल्मों और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए क्या नई सौगात लेकर आई है। चलिए इस खबर में आपको बताते हैं।

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Union Budget 2026

Union Budget 2026 Film And Entertainment Sector

Union Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026 पेश कर दिया है। फिल्म और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बजट 2026 का क्या असर देखने को मिला है, चलिए इस खबर में आपको बताते हैं।

टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं (Union Budget 2026)

देश का फिल्म और मनोरंजन उद्योग एक बार फिर केंद्रीय बजट 2026 की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा था। हालांकि साफ कर देना जरूरी है कि बजट में फिल्म उद्योग से जुड़े कर ढांचे, जीएसटी दरों या आयकर स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है। फिल्मों की टिकट खरीद में टैक्स उतना ही देना होगा जितना कि पहले देना पड़ रहा था। यानी फिल्मों की टिकट खरीद में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसके बावजूद इंडस्ट्री के अंदर ये चर्चा तेज है कि आने वाले समय में नीतिगत सहूलियतें और प्रोत्साहन इस सेक्टर की रफ्तार बढ़ा सकते हैं।

बजट 2026 में कोई संशोधन नहीं

पिछले कुछ वर्षों में बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों की कमाई पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाई है। महामारी के बाद दर्शक दोबारा सिनेमाघरों तक लौटे जरूर हैं, लेकिन वह रफ्तार अब भी असमान बनी हुई है। इसी बीच जीएसटी 2.0 लागू हुआ, जिससे कई वस्तुओं और सेवाओं की कर दरों का पुनर्गठन किया गया। सिनेमा टिकटों को लेकर भी पहले से चली आ रही बहस फिर से सामने आई, हालांकि मौजूदा बजट में इसमें किसी तरह का संशोधन नहीं हुआ है।

टिकटों पर टैक्स का बोझ

फिल्म प्रदर्शकों का मानना है कि टिकटों पर टैक्स का बोझ सीधे दर्शकों की जेब पर असर डालता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में पहले से ही टिकट दरों पर सीमा तय है, जिसके कारण वहां सिनेमाघरों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। इसके उलट उत्तर भारत और बड़े महानगरों में टिकट महंगे होने से परिवार के साथ सिनेमा देखना कई बार महंगा सौदा बन जाता है।

दर्शकों की संख्या कैसे बढ़ सकती है?

इंडस्ट्री से जुड़े संगठन ये दलील देते रहे हैं कि अगर टिकट सस्ते हों तो दर्शक संख्या बढ़ सकती है, खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में। इससे न सिर्फ सिनेमाघरों की ऑक्यूपेंसी बढ़ेगी, बल्कि छोटे शहरों में नए थिएटर खोलना भी आर्थिक रूप से संभव हो पाएगा। रिपोर्टों के मुताबिक भारत में अभी स्क्रीन की संख्या सीमित है और प्रति व्यक्ति सिनेमा देखने की दर अमेरिका और चीन जैसे देशों से काफी कम है।