
छतरपुर तहसील
लोगों को डिजिटल सुविधा और पारदर्शिता मुहैया कराने के उद्देश्य से संपदा 2.0 सॉफ्टवेयर के माध्यम से प्रॉपर्टी रजिस्ट्री की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन इसके बावजूद रजिस्ट्री के बाद होने वाले नामांतरण में आम जनता अभी भी समस्याओं का सामना कर रही है। नियम अनुसार, रजिस्ट्री होने के 30 दिनों के भीतर नामांतरण पूरा हो जाना चाहिए। लेकिन छतरपुर तहसील क्षेत्र में यह प्रक्रिया अक्सर 3 से 6 माह तक लंबित रह जाती है। वर्तमान में लगभग 1165 नामांतरण प्रकरण लंबित हैं।
संपदा 2.0 के तहत रजिस्ट्री के बाद रेवेन्यू केस मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए नामांतरण फॉर्म सीधे साइबर तहसील को भेजा जाता है। इसके बावजूद आवेदनों का निराकरण दो से तीन माह तक नहीं हो पा रहा है। इसके कारण लोगों को बार-बार तहसील और पटवारी कार्यालय का चक्कर लगाना पड़ता है। नाम न छापने की शर्त पर तहसील के एक पटवारी ने बताया कि संपदा 2.0 से होने वाली रजिस्ट्रियों में पटवारी की टीम अनिवार्य रूप से शामिल होती है। इसी कारण प्रकरण जानबूझकर लंबित रखा जाता है। साथ ही, कई पटवारियों ने नामांतरण के लिए 5 से 7 हजार रुपए तक सुविधा शुल्क निर्धारित कर रखा है।
छत्रसाल नगर निवासी सुखदेव शिवहरे ने बताया कि सरानी रोड में उन्होंने 1000 वर्ग फीट का प्लॉट खरीदा था और रजिस्ट्री संपदा 2.0 से हुई। रजिस्ट्री के समय ही नामांतरण शुल्क कट गया, लेकिन छह माह बाद भी उनका नामांतरण नहीं हो पाया। पटवारी द्वारा बार-बार अतिरिक्त शुल्क की मांग की जा रही है।
सागर रोड निवासी दयाराम रैकवार ने भी अपनी परेशानी बताई। उन्होंने छह माह पहले प्लॉट खरीदा था, लेकिन उनका नामांतरण अभी तक नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि पटवारी का कहना है, खसरा नंबर में अधिक खातेदार होने और फाइलों के लंबित होने के कारण नामांतरण नहीं हो पा रहा है।
तकनीकी खामियों के साथ-साथ पटवारियों और स्थानीय राजस्व कर्मचारियों की मनमानी सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। जमीन से संबंधित मामलों में पूरा ब्यौरा दर्ज न कर अधूरी और त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियां पोर्टल पर की जा रही हैं। कई बार नामांतरण और खातेदारी प्रकरणों में जानबूझकर गलत जानकारी अपलोड की जाती है, जिससे आवेदकों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर है, जहां किसान डिजिटल व्यवस्था से पारदर्शिता की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है। संपदा 2.0 के तहत नामांतरण प्रक्रिया संपत्ति की रजिस्ट्री के साथ ही साइबर तहसील के माध्यम से स्वत: शुरू हो जाती है। इस प्रक्रिया में पूरे रकबा की रजिस्ट्री किसी एक व्यक्ति के नाम होने पर मामला साइबर 1 में और एक रकबा में अधिक खातेदार होने पर साइबर 2 में प्रकरण पहुंचते हैं। इसके बाद क्रेता और विक्रेता को एसएमएस द्वारा सूचना दी जाती है और आपत्ति दर्ज करने के लिए लिंक भी उपलब्ध कराया जाता है। दस्तावेज डिजिटल रूप से तैयार होते हैं और ई-कॉपी व्हाट्सएप पर भी भेजी जा सकती है। इसके बावजूद इस पूरी प्रक्रिया में संबंधित प्रकरण में पटवारी की रिपोर्ट अनिवार्य होने के कारण लोगों को तहसील और पटवारी कार्यालयों के चक्कर लगाना पड़ता है। इस तरह संपदा 2.0 की डिजिटल सुविधा के बावजूद भी नामांतरण प्रक्रिया में देरी, अतिरिक्त शुल्क और तकनीकी खामियों के चलते आम जनता परेशान है और अभी भी लंबित मामलों के समाधान की राह देख रही है।
एसडीएम छतरपुर अखिल राठौर ने कहा कि जो भी प्रकरण लंबित हैं, उनका जल्द ही निराकरण कराया जाएगा। साइबर तहसील में आने वाले प्रकरणों का समय पर निराकरण करने के निर्देश राजस्व कर्मचारियों और पटवारियों को दिए गए हैं।
Published on:
07 Feb 2026 10:52 am
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