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Rajasthan News : क्या आपका बच्चा भी खर्राटे लेता है, तो सावधान रहें, इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

साधारण भाषा में कहें तो यह नाक एवं गले के जुड़ाव वाले भाग पर होता है। तीन से चार वर्ष तक की आयु तक एडिनॉइड का आकार सामान्य रहता है। लेकिन, उसके बाद लगातार होने वाली एलर्जी एवं जुकाम से इनका आकार बढ़ता जाता है।

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चित्तौडग़ढ़. खर्राटे आना वैसे तो आम समस्या है। जो कि कई लोगों को होती है। लेकिन, बच्चों में नहीं। बच्चा यदि खर्राटे लेता है तो इसे सामान्य नहीं माना जा सकता। वह एक बीमारी हो सकती है। जिसे एडिनॉइड कहते है। एडिनॉइड के कारण लंबे समय तक नाक बंद रहने, बच्चे के मुंह से सांस लेने के कारण उसके चेहरे में बदलाव आ जाता है। खुला मुंह रखकर सांस लेने से मुंह उभर जाता है। दांत टेढ़े-मेढ़े आते हैं। दांत उठे हुए लगते हैं। ऊपरी होंठ मुड़ा, तालु ऊंचा उठा व नाक पिचक सकता है। एडिनॉइड एक प्रकार का लिंफाइड टिशु होता है। जो नाक के बिल्कुल अंदर पीछे के भाग में होता है। साधारण भाषा में कहें तो यह नाक एवं गले के जुड़ाव वाले भाग पर होता है। तीन से चार वर्ष तक की आयु तक एडिनॉइड का आकार सामान्य रहता है। लेकिन, उसके बाद लगातार होने वाली एलर्जी एवं जुकाम से इनका आकार बढ़ता जाता है।

एडिनॉइड बढऩे से यह होता है खतरा
एडिनॉयड्स का आकार बढऩे से कान एवं नाक को जोडऩे वाली नलिका का रास्ता बंद हो जाता है। जिससे कान में अचानक दर्द होता है। कान में संक्रमण होना, कान से पानी आना, सुनने की समस्या, कान के पर्दे का फट जाना आदि समस्या होती है। एडिनॉयड्स के बढऩे से साइनस में संक्रमण से नाक में दुर्गन्ध आती है। नाक से पानी आता है। एडिनॉइड का आकार बहुत अधिक बढ़ जाता है तो बच्चे को बार-बार नींद से उठना पड़ता है। जिसे ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप कहते हैं। ऐसा शरीर को कम ऑक्सीजन मिलने के कारण होता है। एडिनॉइड का ऑपरेशन बच्चों का ही होता है। जिससे उनके चेहरे, होंठ व नाक आदि में किसी तरह का बदलाव नहीं आए।

इस तरह के होते हैं लक्षण
यदि बच्चा रात में मुंह खोलकर सोता है, लगातार नाक में पानी बना रहता है। कान में दर्द रहता है। सुनने की क्षमता में थोड़ी कमी है और रात को सोते वक्त मुंह से लार गिरती है। ऐसा होने पर बच्चों के नाक के पीछे का एडिनॉइड टिशु बढऩा शुरू हो सकता है। एडिनॉइड टिशु सभी बच्चों में होता है। लेकिन, लगातार नाक में एलर्जी बने रहने व गलत खान-पान से यह बढ़ता है। जिससे नाक के पीछे का भाग बंद हो जाता है एवं बच्चों को सांस लेने में समस्या होती है।

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