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कोर्ट बीएड कॉलेजों पर तल्ख टिप्पणी: कॉलेज नहीं, व्यापार बन गया शिक्षा तंत्र, छात्रों की फीस भी लौटने का दिया आदेश

हाईकोर्ट की युगल पीठ ने बीएड कॉलेजों की संबद्धता को लेकर दायर 6 याचिकाओं को खारिज करते तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा के नाम पर व्यावसायिक दुकानें” चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती और नियमों का पालन किए बिना किसी भी संस्थान को संबद्धता का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने […]

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हाईकोर्ट की युगल पीठ ने बीएड कॉलेजों की संबद्धता को लेकर दायर 6 याचिकाओं को खारिज करते तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा के नाम पर व्यावसायिक दुकानें” चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती और नियमों का पालन किए बिना किसी भी संस्थान को संबद्धता का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने एनसीटीई को भी अपना घर दुरुस्त करने की सलाह देते हुए कहा कि यदि शर्तों का उल्लंघन पाया जाता है, तो मान्यता वापसी की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। यह फैसला न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की खंडपीठ ने सुनाया। याचिकाकर्ताओं पर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन कॉलेजों ने छात्रों से प्रवेश लेकर फीस वसूली है, तो पूरी फीस तत्काल लौटाई जाए। साथ ही, बिना संबद्धता के किसी भी छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

मामला जीवाजी विश्वविद्यालय से संबद्ध बीएड कॉलेजों से जुड़ा था, जिनकी वर्ष 2025-26 के लिए संबद्धता विश्वविद्यालय ने रोक दी थी। कॉलेज प्रबंधन ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उन्हें वर्ष 2017 से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) से मान्यता प्राप्त है, इसलिए विश्वविद्यालय संबद्धता से इनकार नहीं कर सकता। इसके अलावा, कॉलेजों ने यह भी तर्क दिया कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों के आधार पर संबद्धता रोकना मनमाना और गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि एनसीटीई द्वारा दी गई मान्यता अपने आप में अंतिम नहीं होती। मान्यता आदेश भी विश्वविद्यालय, राज्य सरकार और अन्य नियामक संस्थाओं की शर्तों के अधीन होता है। यदि विश्वविद्यालय की निरीक्षण प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाई जाती हैं, तो वह संबद्धता देने से इनकार कर सकता है।

कॉलेजों में आवश्यक सुविधाओं का अभाव

कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए माना कि विश्वविद्यालय की निरीक्षण समिति ने कॉलेज परिसरों में आधारभूत ढांचे की कमी, आवश्यक सुविधाओं का अभाव और शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन जैसे गंभीर तथ्य दर्ज किए हैं। इसके अलावा, कॉलेजों के खिलाफ विशेष कार्य बल (एसटीएफ) द्वारा धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी धाराओं में प्रकरण दर्ज होना भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना।

- विश्वविद्यालय को एनसीटीई के नाम से प्राप्त एक पत्र संदिग्ध प्रतीत होता है। अदालत ने माना कि पत्र का प्रारूप, भाषा और ई-मेल आईडी एनसीटीई की आधिकारिक प्रक्रिया से मेल नहीं खाती, जिससे उसके फर्जी होने की आशंका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर एनसीटीई को पक्षकार नहीं बनाया, ताकि इस पत्र की सच्चाई की जांच से बचा जा सके।

-सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय को संबद्धता देते समय कड़े मानकों का पालन कराने का पूरा अधिकार है। यदि कोई संस्थान शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसे केवल मान्यता के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।

-कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए संबंधित कॉलेज प्रबंधन पर प्रत्येक पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया, जिसे किशोर न्याय निधि में जमा करने के निर्देश दिए गए।

इन्होंने दायर की थी याचिका

लेट सुरेन्द्र प्रताप शिक्षा समिति,. विद्यासुधा वेलफेयर फाउंडेशन समिति, श्यामा देवी दीनदयाल बहुद्देश्यीय प्रचार–प्रसार समिति, विकास जाटव,

गिर्राज नगर, एकता अग्रवाल (गोयल) आदि ने याचिका दायर की थी।