
आईमाता की धर्म भैल
भैल दक्षिण भारत के प्रवास पर
सीरवी समाज की आराध्य देवी आईमाता के संदेश और समाज की सांस्कृतिक विरासत को घर-घर पहुंचाने के उद्देश्य से निकली आईमाता की धर्म भैल (धर्म रथ) इन दिनों दक्षिण भारत के प्रवास पर है। यह भैल 20 जनवरी को राजस्थान के जोधपुर जिले के बिलाड़ा से रवाना होकर देशभर में समाज को जोड़ते हुए आगामी 20 मार्च को पुन: बिलाड़ा पहुंचेगी। भैल यात्रा समाज की धार्मिक परंपरा, एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का सशक्त माध्यम बन रही है।
आईमाता की जीवनी, समाज का गौरवशाली इतिहास
इस धर्म यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सीरवी समाज के इतिहास, संस्कार और आईमाता की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करना है। भैल जहां भी पहुंचती है, वहां धर्मसभाओं के माध्यम से आईमाता की जीवनी, समाज के गौरवशाली इतिहास तथा सामाजिक एकता का संदेश दिया जाता है। पूना बाबाजी, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य दीपाराम काग गुडिय़ा, पोकर बाबा, खेता बाबा, शंकर बाबा, प्रेमा बाबा, राजेन्द्रसिंह पंवार उर्फ पक्षा तथा दिनेश सीरवी काणेचा भैल के साथ हैं।
भैल 3 फरवरी को हुब्बल्ली में
रास्ते में नासिक, पुणे, कोल्हापुर, रत्नागिरी, गोवा सहित कई स्थानों पर समाजजनों ने भैल का स्वागत किया। इसके बाद भैल कर्नाटक पहुंची है, जहां हुब्बल्ली में 3 फरवरी को सुबह 9 बजे धर्मसभा आयोजित होगी, इसी दिन शाम को भैल दावणगेरे के लिए रवाना होगी। इसके बाद टुमकुरु होते हुए बेंगलूरुजाएंगी। बेंगलूरु के जिगनी में 6 फरवरी और होसकोटे में 12 फरवरी को आईमाता मंदिर प्रतिष्ठा समारोह प्रस्तावित है। बेंगलूरु के बाद कर्नाटक के विभिन्न शहरों में होते हुए 8 मार्च को मैसूरु के पास मलवली प्रतिष्ठा के लिए पहुंचेगी। वहां 7 मार्च को बधावना होगा। इसके बाद 14 मार्च को मैसूरु जाएगी। फिर यहां से रवाना होकर 20 मार्च को बिलाड़ा पहुंचेगी।
एक हजार वढ़ेर
राजस्थान में साल में एक बार सीरवी बाहुल्य हर गांव में यह भैल जाती है। देशभर में सीरवी समाज द्वारा आईमाता के लगभग एक हजार मंदिर (वढ़ेर) स्थापित हैं, राजस्थान में आईमाता के 450 वढ़ेर है। मध्यप्रदेश में 216 मंदिर है। दक्षिण भारत के कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र में भी वढ़ेर बने हुए हैं।
Published on:
02 Feb 2026 09:26 pm
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